रविवार, 14 फ़रवरी 2010
कुर्यात् सदा मंगलम
आलेख
मन्नू लाल ठाकुर
पिद्दा बाड़ा, ग्राम - मनौद
पो. - तरौद (बालोद)
जिला - दुर्ग, छत्तीसगढ़
प्रस्तावना
साहित्य समाज का दर्पण है, संप्रति ’’कुर्यात् सदा मंगलम’’ के माध्यम से हलबा समाज के वैवाहिक - सांस्कृतिक क्रियाकलापों पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है। परिवर्तन के दौर में बाह्य शक्तियाँ अतिक्रमण कर सभ्यता और संस्कृति को प्रदूषित करने का भरसक प्रयास करती हैं, ऐसे समय में अपनी सभ्यता और संस्कृति का समुचित ज्ञान ही अस्तित्व की रक्षा में सही मददगार हो सकते हैं। स्वामी विवकानंद का कथन है - ’’ ज्ञदवू ज्ीलेमस ि’’ अर्थात् अपने आपकों जान लेने के पश्चात ही व्यक्ति परिवार और वृहत समाज की पहचान कर पाता है।
अस्तु यह लेख उन नौनिहालोें को समर्पित है, जिनके ऊपर समाज का भरपूर विश्वास है कि वे परिवार व समाज का कुशल नेतृत्व कर अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का सही निर्वहन करेंगे।
मनौद
अक्षया तृतीया - 2008 मन्नू लाल ठाकुर
कुर्यात् सदा मंगलम
पोस्टमेन, पोस्टमेन !
चीनू भाई कहानी सुनने में तल्लीनता से लगा हुआ था, पोस्टमेन की आवाज सुनकर हमने चीनू भाई से कहा - चीनू भाई देखो तो पोस्टमेन आया है, दौड़कर जाओ।
छः वर्षीय चीनू भाई क्लास टू का छात्र है, शहर में पढ़ता है, अवकाश मिलने पर वह बिना नांगा किए दादा-दादी के पास गाँव आ जाता है। ऐसे ही वह गाँव आया हुआ था और दादा से अपनी मनपसंद कहानियाँ सुनने में लगा हुआ था।
चीनू चहकते हुए वापस आया, उसके हाथ में शादी का निमंत्रण पत्र था, जोशिले स्वर में चिल्लाकर बोला - दादा जी आपके लिए बिहाव का नेवता आया है।
हमने पूछा - तुम्हें कैसे मालूम ? ’’ देखो तो सही इसमें लिखा है - शुभ-विवाह, मैंने ठीक कहा न।
हाँ भई, आपने बिलकुल ठीक कहा।
.............. कुछ पल सोचने के बाद चीनू दार्शनिक अंदाज में पूछता है - दादाजी ये विवाह क्या होता है और क्यों होता है ?
चीनू भाई पहले ये बताओ तुम्हारी कहानी अधूरी है, उसे पूरी करूँ या विवाह के बारे में बताऊँ।
दादाजी कहानी तो सुनते रहते हैं, पहले आप विवाह के बारे में बतलाइए।
ठीक है हम आपको विवाह के बारे में ही बतलाते हैं, मगर हाँ एक शर्त पर।
क्या है , वो शर्त ?
यह कि आप सोना मत।
यह कहानी थोड़ी न है कि मैं कहानी सुनते-सुनते सो जाऊँ, आप बताओ तो सही।
चीनू छः साल का बालक है, उसकी बाल सुलभ जिज्ञासा को देखकर मेरा भी मन उसकी जिज्ञासा के लहलहाते पौधों में जल सिेंचन का होने लगा। हमने निश्चय कर लिया कि आज चीनू को विवाह का सारा ज्ञान-कलेवा अवश्य परोसा जावे।
चीनू भाई सुनो यह प्रकृति का सास्वत नियम है दो अनजान युवक और युवती प्रकृति के विकास क्रम में अपना सहयोग प्रदान करने हेतु परिवार और समाज की सहमति और सानिध्य में परिणय सूत्र में बंध जाते हैं और आजीवन एक दूसरे का साथ निभाने का संकल्प लेते हैं , उसे मंगल परिणय कहते हैं। विवाह एक संस्कार है समझौता नहीं और यहीं से व्यक्ति के गृहस्थ जीवन की शुरूवात होती है।
दादा जी आपकी यह बात कुछ-कुछ मेरी समझ में आ रही है, पूरी नहीं। खैर कोई बात नहीं जब बड़ा हो जाऊंगा तो सब समझ जाऊंगा। अच्छा ये बतलाइए विवाह कब करना चाहिए ?
चीनू भाई आपने बहुत ही सुन्दर सवाल पूछा है।
मैं बहादुर बच्चा हूँ न, बहादुर बच्चे हमेशा अच्छी बात करते और अच्छा सवाल ही पूछते हैं। ............. बातों ही बातों में टालिए मत, मैंने जो पूछा है वह बतलाइए।
हाँ, चीनू भाई सुनो - सरकार के नियमानुसार लड़कियों के लिए 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष विवाह हेतु न्यूनतम आयु निर्धारित है।
यह तो सरकार का नियम है, आप भी तो बुजूर्ग हैं, अनुभवी हैं, ज्ञानवान हैं, आप क्या सोचते हैं, आप अपना विचार भी बतलाइए न - चीनू कहने लगा।
चीनू भाई हमारा ख्याल है - लड़कियों की शादी 21 वर्ष और लड़कों की शादी 25 वर्ष से पूर्व न हो। पूर्ण परिपक्वता आने पर ही विवाह होने पर स्वस्थ संतानो की उत्पत्ति होगी तथा इस आयु के पश्चात विवाह होने पर युवक भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर रोजगार के क्षेत्र में आत्म निर्भर हो जावेंगे। बढ़ती हुई जनसंख्या को भी नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।
हाँ, दादा जी कच्चा आम खट्टा होता है और अच्छा सा पका आम स्वादिष्ट। ............ मैंने ठीक कहा न।
बिलकुल ठीक कहा।
दादा जी आपने विवाह और विवाह के लिए उचित आयु की जानकारी दी, अब विवाह कैसे होता है, दो अनजान युवक और युवती एकाएक परिणय सूत्र में कैसे बंध जाते हैं - ये सब जानने के लिए मेरा मन मचल रहा है, आप सारी बातें विस्तार से बतलाइए।
चीनू भाई समाज काफी विस्तृत और व्यापक है, यह दूर-दूर तक फैला हुआ है, परिवार उसकी एक इकाई है। समाज में पारिवारिक नाते-रिस्तों का ताना-बाना फैला हुआ है, समाज के लोग नाते रिस्तों को जोड़ने में एक दूसरे की मदद करते हैं, सम्पर्क माध्यमों से विवाह का प्रस्ताव रखते हैं, सामाजिक सम्मेलनों में विवाह योग्य युवक-युवतियों का परिचय-कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, तथा उनका सचित्र बायोडाटा प्रकाशित किया जाता है। जिससे लोगों को वांछित वर-वधू तलाशने में मदद मिलती है।
दादा जी यह बतलाइए रिस्ता तय करने में किन-किन बातों का ध्यान रखा जाता है ?
चीनू भाई हलबा आदिवासी समाज की अपनी अलग पहचान है और इस पहचान को बनाए रखने के लिए हलबा समाज कटिबद्ध है। सर्वप्रथम रिस्ता का पहल गोत्रज से प्रारंभ होता है। लड़की और लड़का दोनों के मातृ पक्ष और पितृ पक्ष के गोत्रज का मिलान किया जाता है। चारों में से किसी एक का समान गोत्रज होने पर वैवाहिक रिस्ता नहीं हो सकता, वहाँ भाई बहन का रिस्ता बनता है। रिस्ता तय करने हेतु यह पहली सीढ़ी है। चीनू भाई मैं तुम्हें बताना चाहूंगा कि हलबा समाज में प्रचलित यह सामाजिक अवधारणा विज्ञान सम्मत है क्योंकि सिफलिस नामक महारोग के प्रकोप से समाज को सुरक्षा प्रदान करता है। निकटतम रिस्तेदारी में विवाह सम्बंध सिकलिन नामक महादैत्य को आमंत्रित करता है।
हलबा समाज रिस्तों की पवित्रता और मधुरता को महत्व देता है। दो सगी बहनों के सगी देवरानी और जेठानी होने की अनुमति नहीं देता समाज।
दादा जी आप यह बतलाइए कि समाज ने एैसा नियम क्यों बनाया होगा ?
चीनू भाई हमारे पूरखा लोग वैज्ञानिक सोच रखते थे। जैसे विज्ञान में क्यों, क्या, कैसे आदि प्रश्नों का समााधान खोजा जाता है, वैसे ही हमारे सामाजिक चिन्तक पारिवारिक सुख और शांति के बारे में चिन्तनशील थे। महिलाओं के तीजा पर्व का विशेष महत्व होता है, महिलायें उस दिन मायके में रहकर पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं और इससे बढ़कर दूर-दराज गयी अपनी बहनों से मायके में भेंट होने का और मिल जुलकर बतियाने और व्रत रखने की सुखद अनुभूति जो होती है वैसा सुखद पल और कहीं नहीं होता। सगी बहनों के परस्पर देवरानी-जेठानी बनने से दो बहनों का पवित्र प्यार जहरीला बन जाता है। हमारे सामाजिक मनीषी इस तथ्य से भली भाँति परिचित थे कि बहनों का पवित्र प्रेम देवरानी-जेठानी के डाह में जलकर राख न हो जाय।
दादा जी हमारे पुरखा लोग क्या गजब का दिमाग रखते थे।
हाँ चीनू वे लोग पढ़े लिख नहीं थे, न ही आज की तरह सुविधायें थी किंतु वे ज्ञानमार्गी और कर्ममार्गी थे। उनका चिन्तन छल-कपट से रहित सार्थक और व्यावहारिक हुआ करता था तभी तो उनके द्वारा प्रतिपादित रीति-रिवाज व परम्परायें आज भी मान्य और प्रचलित हैं।
दादा जी रिस्ता बनाने में और किन-किन बातों को देखना चाहिए ?
चीनू भाई आपने बहुत ही सुन्दर सवाल किया है।
दादा जी आप बार-बार यही रट लगाए रहते हैं, अच्छा सवाल किया है - अच्छा सवाल किया है। अरे अच्छा सवाल किया तो अच्छा सा जवाब दो न।
हाँ चीनू भाई सुनो - हमारे पुरखे लोग कहते थे - ’’पानी पियो छान के और बेटी लो, दो जान के’’ - क्या समझे ?
’’गंदा पानी पीने से व्यक्ति बीमार हो जाता है’’ - और क्या ? वैसे ही गलत जगह रिस्ता होने से परिवार बीमार हो जाता है अर्थात पारिवारिक कलह से परिवार तबाह हो जाता है।
चीनू भाई ये तो रही हमारी सामाजिक परम्पराओं से सम्बंधित बातें। आज हमारी सोच और विचारों में जटिलतायें समा गई हैं, हम किंकत्र्तव्य की स्थिति में हैं। विचारों के इस भंवरजाल में विवेक रूपी पतवार से ही हम उफनती दरिया को पार कर सकते हैं।
’’वो कैसे ?’’
वो ऐसे - हमारे पूर्वजों की जीविका का प्रमुख साधन कृषि, अब परिवार बढ़ने के साथ-साथ सिमट कर रह गयी है, जनसंख्या बढ़ी कृषि जमीन घटी, फलस्वरूप जीवन संघर्षशील हो गया है। कृषि के सिवाय अन्य उद्य़मों के प्रति हम नितांत उदासीन हैं। अतः हम अपना भविष्य सरकारी नौकरियों में तलाश रहे हैं, जहाँ बैठे बिठाये नियमित आय होती रहे। सरकारी नौकरी के अभाव में जीविका का अन्य विकल्प हमारे पास नहीं है। आर्थिक सुरक्षा की चिन्ता उच्च शिक्षा प्राप्त संतानें, यही सब सामाजिक समस्या बनती जा रही है। शिक्षा है तो रोजगार नहीं, रोजगार है तो आर्थिक सुरक्षा नहीं। अतः माता-पिता यह निर्णय नहीं कर पा रहे हैं कि रिस्ता कहाँ बनावें। चतुर नाविक उफनती दरिया को अपने विवेक से पार कर जाता है, वैसे ही विवेकशील माता-पिता अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त संतानो के लिये स्वरोजगार व सही समय में सुखद गृहस्थ की व्यवस्था कर सकते हैं।
दादा जी ठोस-ठोस बातें आप संक्षेप में बताओ न ?
हाँ चीनू मैं वही बताने जा रहा हूँ। रिस्ता जोड़ने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, पारिवारिक संस्कार ये प्रमुख बातें हैं। सूरत के बजाय सीरत तथा रूप के बजाय गुण अधिक महत्वपूर्ण है। रिस्ता बनाने में मानसिक हीन भावना की दीवार खड़ी न करें, धन और पद का अहंकार न पालें। झोपड़ी को हवेली बनने में और हवेली को ढहने में कोई समय नहीं लगता इसलिए चीनू भाई जहाँ चाह वहाँ राह, ’’कर्मण्ये वाधि कारस्ते मा फलेषु कदाचन’’ का अनुसरण करें।
दादा जी आपने रिस्ता तय करने में आवश्यक जानकारी व दिशा निर्देश दिये, अब यह बतलाइए कि सामाजिक परम्परानुसार आगे किन बातों का अनुसरण किया जाना चाहिए क्योंकि मेरी जिज्ञासा उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है, अब सारी बातों का, रस्म रिवाजों को विस्तार से बताकर मेरी जिज्ञासा शांत कीजिए।
चीनू भाई, जन्म से लेकर गृहस्थाश्रम में प्रवेश के पूर्व तक का समय शिक्षा ग्रहण करने, कठिन तप और साधना करने का होता है। इस अवस्था में व्यक्ति कठिन तपस्या और साधना में जितना समय देता है, गृहस्थाश्रम व उसके आगे का जीवन उतना ही सुखद मीठा फल देने वाला होता है। यदि गुलाब का फूल पाना चाहते हो तो गुलाब का कलम लगाना होगा, बेसरम का कलम लगाकर गुलाब का फूल हासिल नहीं कर सकते।
हलबा समाज का समूचा सामाजिक ढांचा एक मजबूत बुनियाद पर टिका है। समाज के रीति-रिवाज व प्रचलित परिपाटियों में समयानुकूल बदलाव की अनुकूलता है। नियम-कानून-कायदे जितने कठोर होते हैं वह समाज के विकास में उतना ही अवरोध का काम करता है और ऐसा समाज सामाजिक विघटन और बिखराव झेलने के लिये मजबूर हो जाता है। हमारे हलबा समाज की पुरातन परिपाटियों में आंशिक संशोधन कर अद्यतन परिवेश में स्वीकार्य किया गया है। बाह्य कलेवर में बदलाव तो आया है, किन्तू मूल सामाजिक पहचान को यथावत बनाए रखने का भरसक प्रयास किया गया है। सामाजिक परिवर्तन के दौर में बाह्य शक्तियाँ अतिक्रमण का पुरजोर प्रयास करती हैं, संप्रति सामाजिक संस्कृति के सम्पूर्ण संरक्षण के लिए सशक्त मानसिकता अति आवश्यक होती है। हमें अपनी सांस्कृतिक शोध व विरासत को संरक्षित बनाए रखने के लिये विवेकशील चिन्तन, गहन अनुसंधान की आवश्यकता है, अतः सामाजिक-सांस्कृतिक अध्ययन केन्द्र स्थापित कर अनवरत चिन्तन व मनन द्वारा सामाजिक परम्पराओं की वैज्ञानिकता को सर्वसमाज के सम्मुख प्रकट कर हम अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता को प्रतिपादित कर सकते हैं।
दादा जी ओर ऐसी कौन सी प्रथा है जिसमें रिस्ता बनाने के लिए लड़की का लेना देना होता है?
चीनू भाई हमारे ही हलबा समाज में गरियाबंद, नगरी, सिंहावा के वनांचल में एक विचित्र प्रथा है जिसे हमारे बालोद क्षेत्र में सपने में भी सोच नहीं सकते।
ऐसी कौन सी विचित्र प्रथा है, दादा जी जिसे हम सपने मंें भी सोच नहीं सकते आप जल्दी से बतलाइए और मेरी जिज्ञासा शांत कीजिए।
उन क्षेत्रों में मामा और बुवा की संतानों का परस्पर वैवाहिक रिस्ता हो सकता है, किन्तु हमारे यहाँ भाई-बहन के पवित्र रिस्ते को तिलांजलि देकर परस्पर शादी की बात सपने में भी नहींे सोच सकते।
दादा जी ऐसी उल्टी गंगा वहाँ क्यों बह रही है, इसका कारण स्पष्ट कीजिए।
सिंहावा नगरी, प्राचीन ऋषि मुनियों की तपोभूमि है, सघन वनों से आच्छादित, उच्च पर्वत मालाओं से घिरा यह अरण्य क्षेत्र सर्वदा दुर्गम रहा है। यातायात व संचार साधनों के अभाव के कारण अन्य क्षेत्रों से उनका सम्पर्क नगण्य था। सीमित जनसंख्या व दुर्गम भौगोलिक संरचना के कारण निकटतम रिस्तेदारी में वैवाहिक सम्बंध बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा होगा, किन्तु अब शिक्षा और संचार साधनों के विकास के साथ ही उनका सम्पर्क अन्य क्षेत्रों से होने लगा है, संप्रति इस प्रथा के प्रति लोगों में अनइच्छा व उदासीनता देखी जा रही है।
दादा जी ऐसी ही कोई विचित्र प्रथा प्रचलित हो तो उसके बारे में भी बतलाइए।
हाँ चीनू सूनो - ऐसी ही एक प्रथा का नाम है गुरावट। यह प्रथा हलबा समाज में न तो प्रचलित है और न ही मान्य है क्योंकि इस प्रथा में दोनों ही पक्ष एक-दूसरे को अपनी-अपनी लड़की देने की शर्त रखते हैं। प्रायः आगे चलकर दोनों परिवारों के बीच आपसी सम्बंधो में कड़ुवाहट आने से वैमनस्यता की आशंका बढ़ जाती है। अतः हमारे मनीषियों ने दूरगामी दुष्परिणामों को पहले ही सोचकर ऐसी प्रथा को समाज से सर्वथा दूर ही रखा। क्यों चीनू भाई, मान गए न हमारे पूर्वज कितने ज्ञानी थे। इसीलिए मैं कहता हूँ, हमारी समाज व्यसस्था की जड़ अत्यंत मजबूत है। सजन सात पीढ़ी के लिए बनता है, अतः जो भी निर्णय लिये जाते हैं, सोच समझ कर लिये जाते हैं। हमारे पूरखों का चिन्तन सतही नहीं था, वे दूर तक सोचते थे। उनकी सोच का मीठा फल आज हमको चखने को मिल रहा है। हमारी हलबान संस्कृति के संबंध में यह उक्ति चरितार्थ होती है - ’’कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ............’’
’’कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ............’’ वाह ! क्या कहने ! दादा जी , ऐसे ही कुछ रोचक प्रसंग और बतलाइए।
अनुशासित आदि संस्कृति का धारक हलबा समाज गहन अनुसंधान के लिए खुला आमंत्रण देता है। इसी क्रम में एक रोचक प्रसंग और सुनाता हूँ। चीनू भाई तुम्हें हलबा समाज के सांस्कृतिक समुंदर में गहन गोता लगाना होगा।
हाँ-हाँ दादा जी मैं बिलकुल तैयार हूँ, आप आगे-आगे चलिए, पीछे मैं हूँ।
हाँ, तो सुनो, भाभी की बहन या भाई से तथा जीजा के भाई या बहन से विवाह नहीं हो सकता अर्थात समधी या समधिन से वैवाहिक सम्बंध समाज में बिलकुल स्वीकार्य नहीं है। यही कारण है अनुशासन बद्ध हलबा समाज अपनी अस्मिता की रक्षा करने में बिलकुल सफल रहा है। चीनू भाई , आपने रामायण पढ़ा है।
हाँ-हाँ, हमने पढ़ा है - भगवान राम, लघु भ्राता लक्ष्मण, माता सीता तथा राम भक्त हनुमान इनको कौन नहीं जानता। पूरी दुनिया जानती है। .............. दादा जी ऐसा लगता है आप कोई पहेली बुझा रहे हैं, है न यही बात।
चीनू भाई तुम्हारा अनुमान बिलकुल सही है। भगवान राम के वनवास काल की बात है, जब भगवान राम और लक्ष्मण स्वर्ण मृग का शिकार कर पर्णकुटीर में वापस लौटे तो माता सीता कुटिया में नहीं थी। भगवान राम ने लक्ष्मण से कहा - भाई सीता कहाँ चली गई, किसने उसका हरण किया, उन्हें खोजो। तब भाई लक्ष्मण ने निवेदन किया, भैया मैंने भाभी सीता के मुख-कमल का कभी दर्शन नहीं किया है, मैं उन्हें कैसे पहचानूंगा। मैंने हमेशा भाभी के चरण कमलों की पूजा की है। ................ चीनू भाई, हलबा समाज में भाभी का स्थान माता के तुल्य माना गया है। अतः भाभी को चुड़ी नहीं पहना सकते, अर्थात भाभी को पत्नी के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती। ’’यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते तत्र रमन्ते देवताः’’ हलबा समाज में जन्म देने वाली माता तथा काकी, भाभी, भांजी तथा छोटी बहन आदि को मातृ देवी के रूप में, इनकी आराधना की जाती है, तभी तो देवर - देवता के समान उस घर में वास करता है।
दादा जी इसका मतलब हुआ कि हलबा समाज में नारी को बहुत ऊँचा स्थान दिया गया है।
हाँ, चीनू बिलकुल सही कहा तुमने। माँ-दुर्गा, माता दन्तेश्वरी के रूप में हमारी आराध्य है, जगदम्बे माँ भवानी माता शक्ति और लक्ष्मी के रूप में साक्षात प्रगट है। नारी शक्ति अपने विविध रूप और नाम से नानाविध लीला करती है, बहु, बेटी, बहन, भार्या, माता आदि रूपों में पुरूषों के समीप रहकर पुरूष के पुरूषार्थ को प्रोत्साहित करती है। माता केवल देती है, बदले में कुछ नहीं लेती, इसीलिए तो कहा गया है - ’’अबला, हाय तेरी यही कहानी, आँचल में दूध और आँखों में पानी।’’
चीनू भाई, तुमको नींद तो नहीं आ रही है।
वाह ! दादा जी मुझे क्यों नींद आने वाली, आपको आ सकती है, क्योंकि आप बोलते-बोलते थक गए होंगे। मुझे तो बड़ा आनंद आ रहा है।
अच्छा तो सुनो। समाज में एक प्रथा और है, उसे कहते हैं - बरेंडी। यह दो प्रकार की होती है - पहला - जियत बरेंडी और दूसरा मरे बरंडी। इसे कान लगाकर सुनना, यह अति गंभीर विषय है। शादी का रस्म पूरा होने पर, कन्या की बिदाई (गवना) का नेंग पूरा कर दिया जाता है, परिस्थितिवश कन्या गवना का नेंग पूरा होने के बावजूद अभी पिता के घर से पति गृह (ससुराल) नहीं पहुँच पाई है और कोई दुखद घटना हो जाती है - यथा नवविवाहित पति का आकस्मिक निधन, तो ऐसी स्थिति में नवविवाहिता विधवा नहीं कहलाएगी तथा हाथ की चूड़ी नहीं फूटेगी। अस्तु वह कन्या मरे बरेंडी कहलाएगी। इसी प्रकार कन्या के प्रथम ससुराल जाने से पूर्व यदि वधु पक्ष और वर पक्ष में कुछ गंभीर कारणों से मतभेद उत्पन्न हो जाता है, यथा - लड़का नशेड़ी है, व्यभिचारी है, अपराधी है, असाध्य रोगों से पीड़ित है आदि। ऐसे संगीन आरोपों के आधार पर यदि माता-पिता अपनी कन्या को भेजने से मना कर दें अथवा वर पक्ष कन्या ले जाने से मना कर दें तो समाज का न्याय , विभाग इन आरोपों की सूक्ष्मता से जाँच पड़ताल करता है। आरोप सही साबित होने पर लड़की जियत बरेंडी घोषित कर दी जाती है तथा पूर्व विवाहित पति के पास लड़की न भेजकर लड़की के माता-पिता व समाज को निर्देशित किया जाता है कि योग्य वर मिलने पर सामाजिक नियमानुसार अन्यत्र अपनी कन्या का विवाह कर सकते हैं।
बरेंडी कन्या (दोनों) का विवाह समाज की उपस्थिति में अत्यंत सादे समारोह में सम्पन्न होता है, जिसमें वर पक्ष बारात लेकर कन्या घर आता है, कन्या की मांग करता है, चूड़ी पहनाता है, और कन्या को पत्नी के रूप में वरण करता है।
हलबा समाज में स्त्री और पुरूष दोनों को समान दर्जा दिया गया है। किसी महिला के विधवा हो जाने पर यदि वह महिला पुनर्विवाह करना चाहती है तो समाज उसे सहर्ष अनुमति प्रदान करता है। विधवा विवाह में भी बरेंडी विवाह की तरह वर पक्ष बारात लेकर आता है, माँग में सिंदूर भरता है, चूड़ी पहनाता है और विधवा महिला को समाज की उपस्थिति में अपनी पत्नी के रूप में अंगीकार करता है।
इसी प्रकार पति के जुल्म से पीड़ित अथवा पति के नशेड़ी, अपराधी, व्यभिचारी अथवा स्वास्थ्यगत कारणों से पति का त्याग कर अथवा पति द्वारा त्यागे जाने पर कोई महिला अपने माइके में आ जाती है तो वह छड़वे कहलाती है। उसे भी सामाजिक परम्परानुसार दूसरा पति वरण करने का अधिकार है।
दादा जी हमारे दोस्त लोग खेल-खेल में कुछ बदमाशी करते हैं, कोई गेंद छिपा देता है, कोई किसी को मार देता है, कोई किसी को गाली बक देता है, क्या समाज में भी ऐसी हरकतें होती हैं ?
समाज एक पवित्र संस्था है, यहाँ सबको समान अवसर मिलते हैं। फिर भी कुछ लोग समाज की मुख्य धारा से भटक जाते हैं और ऐसे कृत्य कर बैठते हैं जो समाज में प्रचलित परम्पराओं के सर्वथा प्रतिकूल होते हैं। बगीचा में पौधों को एक समान खाद पानी दिया जाता है, फिर भी कुछ पौधे विकास में पिछड़ जाते हैं, रोगग्रस्त हो जाते हैं। अतः अविकसित तथा रोगग्रस्त पौधों को अतिरिक्त देखरेख व उपचार की जरूरत होती है। ठीक उसी प्रकार समाज में भी कुछ लोग असामाजिक कृत्य कर सड़ी मछली का कार्य करते हैं। एक सड़ी मछली से तालाब का जल प्रदूषित हो जाता है ठीक उसी प्रकार एक व्यक्ति के असामाजिक कृत्य से समाज व्यवस्था बाधित हो जाती है। चतुर माली रोगग्रस्त पौधे का त्वरित उपचार प्रारंभ कर देता है। आवश्यकता पड़ने पर उस पौधे को उखाड़कर नष्ट भी कर देता है, ठीक उसी प्रकार समाज में भी प्रकृति का यह शाश्वत नियम लागू होता है।
दादा जी आप तो नयी-नयी बातें बताकर मेरी जिज्ञासा बढ़ाते जा रहे हैं। समाज में ऐसे कौन से असामाजिक कृत्य हैं जो सड़ी मछली की तरह समाज-सरोवर के पवित्र जल को प्रदूषित करते हैं, शीघ्र बतलाइए ?
चीनू भाई ऐसा लगता है, तुमने आज खाना, खेलना, टी.वी. देखना सबको बाय कर दिया है।
दादा जी आप बात ही ऐसी बता रहे हैं कि अन्य बातों का कोई महत्व ही नहीं है। समाज के रोचक प्रसंग से बढ़कर दूसरा कोई हो ही नहीं सकता, ................ टालिए मत शुरू हो जाइए।
बगीचा में कितना अच्छा बीज डालते हैं, फिर भी खरपतवार पैदा हो ही जाते हैं, समाज में भी कुछ लोग खरपतवार की तरह ऊग आते हैं। प्रकृति ने दुर्जन और सज्जन दोनों तरह के इंसान पैदा किये हैं, सज्जन सही राह पर चलते हैं और दुर्जन उल्टी दिशा में चलते, सोचते और करते हैं, जब कोई युवक युवती समाज व्यवस्था को धता बताकर, अपना घर व परिवार त्यागकर घर बसाने की इच्छा मन में पालकर अन्यत्र भाग जाते हैं, तो इसे उढ़रिया ले जाना कहते हैं अर्थात समाज व परिवार की बिना सहमति से एक व्यक्ति अन्य युवती या महिला को उड़ाकर ले जाता है। उढ़रिया प्रथा को समाज द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है फिर भी समाज सामाजिक नियमानुसार इसका उपचार करता है।
जैसे उढ़रिया प्रथा एक सामाजिक कलंक है, वैसे ही पैठू प्रथा समाज में नासूर की तरह है। उढ़रिया की तरह पैठू की उत्पत्ति होती है। दो युवक युवती अथवा स्त्री पुरूष का अवैध प्रेम प्रसंग की अंतिम परिणति उढ़रिया या पैठू होती है। उढ़रिया में दोनों प्रेमी युगल घर और परिवार का त्यागकर अन्यत्र भाग जाते हैं तथा अज्ञातवास में रहते हैं। समाज को पता चलने पर सामाजिक कदम उठाया जाता है अथवा वे खुद समाज के शरणागत होकर आत्मसमर्पण कर देते हैं। पैठू में प्रेमिका अपने प्रियतम के घर आ जाती है अर्थात प्रेमिका प्रेमी के घर पैठारो ले लेती है। दोनों के परिवार वाले इस तथ्य को समाज के सामने रखते हैं या समाज स्वतः हस्तक्षेप कर सामाजिक पूछताछ कर सामाजिक परम्परानुसार उचित व्यवस्था देता है।
दादा जी आप यह बतलाइए कि लोग ऐसा दुस्साहस क्यों करते हैं, क्या उन्हें समाज के लोक लाज का किंचित मात्र भी भय नहीं रहता ?
इस प्रकार की सामाजिक अनुशासनहीनता के कई कारण हैं, यथा -
प्रथम - अशिक्षा से व्यक्ति कुंठित मानसिकता लिये विवेकहीन हो जाता है।
द्वितीय - दरिद्रता मानसिक हीन भावना के लिये उत्प्रेरक का काम करती है।
तृतीय - परिवार में सबल पारिवारिक नेतृत्व व मार्गदर्शन का अभाव परिवार को प्रदूषित होने व बिखरने से रोक नहीं पाता।
चतुर्थ - माता-पिता द्वारा अपनी संतान की बिना सहमति के अपने निर्णय को संतानों पर दबाव पूर्वक थोपना।
पंचम - दूरदर्शन द्वारा उत्तेजक सीरियलों का प्रसारण कर युवक-युवतियों में काम वासनाओं का भोंडा तरीके से परोसना व उत्तेजित करना।
षष्ठम - आयातित पाश्चात्य साहित्य, संगीत, संस्कृति, शिक्षा आदि का भारतीय जनजीवन में अंधाधूंध अतिक्रमण।
सप्तम - भारत के आध्यात्मिक परिवेश में पाश्चात्य भौतिकवाद का हस्तक्षेप।
अष्टम - आदिवासी अंचलों में प्रचलित शिक्षा पद्धति व व्यवस्था का दोषपूर्ण होना।
नवम् - आदिवासियों के प्रति शासन व प्रशासन द्वारा मानवीय आचरण का नितांत अभाव।
दशम - शासन के विकास कार्यक्रमों में आडंबर अधिक व क्रियान्वयन न के बराबर।
चीनू भाई ये कड़वे सच हैं जो आज हमारी समाज व्यवस्था, सभ्यता व संस्कृति पर महादानव बनकर लगातार हमला कर रहे हैं और हम निस्सहाय बनकर ठगे से रह गये हैं, सामाजिक संस्कृति पर कुठाराघात हमारे अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर रहा है।
दादा जी, यह तो भयावह स्थिति है, हमारा गौरवशाली अतीत, पलभर में धराशायी होता दिख रहा है।
नहीं चीनू, आशंकित होने की कोई आवश्यकता नहीं है। नयी पीढ़ी सुशिक्षित, सुसंगठीत और आत्मानुशासित होकर खड़ी हो चुकी है, हमारी सामाजिक व सांस्कृतिक बुनियाद मजबूत है, अतः क्षणिक झंझावात इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।
समाज अपने सामाजिक सदस्यों पर सूक्ष्म नजर रखता है, किसी भी सदस्य द्वारा चाहे वह पुरूष हो या महिला, अन्य स्त्री या पुरूष के साथ अनैतिक सम्बंध खोरभूल माना जाता है। समाज ऐसे सामाजिक मामलों की गहराई से जांच पड़ताल करता है और खोरभूल का आरोप सही साबित होने पर सामाजिक नियमानुसार व्यवस्था दी जाती है। खोरभूल एक अनैतिक आचरण है और समाज ऐसे घृणित आचरण को निरूत्साहित करने के लिये हमेशा प्रयत्नशील रहता है।
दादा जी, समाज में प्रचलित और ऐसी मान्यताएं जिसके बारे में नयी पीढ़ी अनभिज्ञ हो, उन पर प्रकाश डालिए।
सामाजिक रीतिरिवाजों, प्रथाओं और परम्पराओं से हमारी लोक संस्कृति पोषित होती है, समाज व्यवस्था इनसे अलंकृत होकर आलोकित होती है। हलबा समाज में दैवीय आस्था सर्वोपरी है। घटित होने वाली हर घटना में दैवीय कारक को विशेष महत्व दिया जाता है। स्त्री जाति के किसी
भी जातक के शारीरिक जख्म पर जीव पड़ जाने (कीड़े पड़ जाने) पर उसे दैवीय घटना मानी जाती है, और ब्याधिग्रस्त उस बच्ची, किशोरी, युवती अथवा स्त्री की पहचान फूलपरी के नाम से होती है। फूलपरी को लेकर शादी ब्याह में कोई परेशानी नहीं होती किन्तु माईघर में इसका प्रवेश वर्जित माना जाता है।
ऐसी महिला जिसका एक बार विवाह हो चुका है, किन्तु वह स्वतः या पति द्वारा त्यागे जाने पर दूसरा विवाह कर लेती है, वह दूधरी कहलाती है। इन्हें भी माईघर में प्रवेश नहीं दिया जाता। फूल परी व दूधरी महिलाओं की तरह विधवा महिलाओं को भी माईघर में प्रवेश नहीं दिया जाता, किन्तु माईघर से सम्बंधित विधवा महिलाओं के लिये यह बंधन लागू नहीं होता।
हमारे हलबा समाज में पितृ सत्तात्मक समाज व्यवस्था प्रचलित है। लड़कियाँ विवाहोपरांत माता-पिता का घर त्यागकर ससुराल में पति के घर अपना घर बसाती हैंै। विशेष परिस्थितियों में पुरूष अपना पैतृक घर छोड़कर ससुराल में अपनी पत्नी के माता-पिता के घर में घर बसा लेता है। ऐसा दामाद घरजवांई या लमसेना कहलाता है, सामाजिक नियमानुसार इनका विवाह संपन्न होता है।
परस्पर सहमत होने पर वर पक्ष वधु पक्ष के घर पहुँचता है। दोनों पक्षों की सहमति पर सर्वप्रथम लड़की चिन्हारी (चूमा लेना) का नेंग किया जाता है। समधियों का परस्पर जोहार भेंट करना व कन्या द्वारा पाँव छूकर आशीर्वाद लेना रिस्ता का पक्का होना मान लिया जाता है। यह सब समाज की उपस्थिति में होता है।
दोनों पक्ष आपस में मिल बैठकर फलदान (सगाई) की तिथि निश्चित करते हैं। वर पक्ष सगाई बारात लेकर आता है और सर्वप्रथम महलिया के घर उतरता है, महलिया बारातियों को आदर पूर्वक अपने निवास में डेरा देता है तथा वधू पक्ष को बारात पहुँचने की सूचना देता है।
वधु के घर बारातियों के पहुँचने पर प्रवेश द्वार पर ही शीतल जल से बारातियों का पाँव पखारते हैं और मस्तक में अक्षत का टीका लगाकर आत्मीय अभिनंदन किया जाता है। वधु पक्ष के घर के आंगन में घराती व बाराती एक साथ बैठकर सगाई का नेंग संपन्न करते हैं। इस अवसर पर वर पक्ष से आया हुआ कूंड़ा (करी लाड़ू या बुंदी का लड्डू का कलेवा) महलिया के माध्यम से वधु पक्ष को सौंप दिया जाता है। दोनों पक्ष गौरी-गणेश की पूजा करते हैं, वर पक्ष से लाया गया वस्त्राभूषण धारण कर वधू भी गौरी गणेश की पूजा करती है तथा उपस्थित समस्त जनों का पाँव छूकर आशीर्वाद लेती है, दोनों पक्ष के समधी अक्षत चावल दूब आदि का टीका लगाकर जोहार भेंट करते हैं।
दादा जी आपने यह तो बताया ही नहीं कि सगाई का नेंग किस समय संपन्न होता है तथा पूजा कौन कराता है।
यही तो मैं जानना चाहता था कि चीनू रूचिपूर्वक मेरी बातें सुन रहा है या नहीं। हलबा समाज में चढ़ती बेरा को सगाई के लिये अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि दोपहर के समय विद्यमान अभिजीत मुहुर्त शुभ कार्यों के लिये अत्यंत मंगलकारी माना गया है।
मांगलिक कार्य संपन्न कराने के लिये समाज का ही व्यक्ति जोशी (ज्योतिषी) का काम करता है, जगदम्बे, माँ भवानी - दन्तेश्वरी के उपासक को अन्य किसी पुरोहित की क्या आवश्यकता है।
शादी का मुहुर्त निकट आता देखकर वर पक्ष में सक्रियता बढ़ गयी। चावल-दाल, तेल-फूल, कपड़ा-लत्ता धीरे-धीरे सबका जोरा होने लगा। हता भर बचा था कि घर का मुखिया लगिन पहुँचाने की व्यवस्था में लग गया। घर की वरिष्ठ महिला कुछ ज्यादा ही उत्साहित थी, कभी बहू को, कभी बेटा को और कभी खुद दौड़-दौड़कर सामान सकेलने में लग गयी, और गिनती कर-कर के हाँ ये पर्रा और बिजना हो गया, तेल चधनी मौर को, करसा में भर दिया, तेल हल्दी को बड़े जतन के साथ गठिया के रख दिया और ले जाने वालों को विशेष समाझाईश दी - सम्भाल के ले जाना, ऐसी-वैसी जगह रखना मत, और हाँ वो तेल चधनी साड़ी को बता के देना, फिर सारा सामान एक साथ संजोकर उनको रवाना कर दिया।
मोटर सायकल स्टार्ट किये और दोनों सामान लेकर हवा में उड़ने लगे। जाते-जाते उन्होनें महलिया को मोबाइल से अपने आने की खबर दे दी। महलिया के साथ वे सगा के घर पहुँच गये। महिलाओं ने देहरी में लोटे से पानी डालकर पहुना समेत लगिन का स्वागत किया और यथोचित आदर सहित अंदर लिवा लाये।
मांगलिक कार्यक्रम का प्रारंभ हो चुका है, आंगन के बीचों बीच खाट बिछाकर नयी चादर डाल दी गई। देवी देवताओं की पूजा-अर्चना की गई। दूल्हा राजा नयी धोती में बन ठन कर तैयार है, भाभियों ने देवर बाबू को खींचकर ले आया और कुरवर का नेंग प्रारंभ हो गया। कुरवर चावल के अधपके भात से निर्मित शादी का प्रथम कलेवा होता है।
अगले दिन प्रातः से ही समाज वालों का शादी वाले घर में पहुँचना शुरू हो जाता है, घर का आंगन डूमर, नीम आदि के डारा से ढँक दिया जाता है। प्रवेश द्वार पर दो लम्बे बाँस गड़ाकर ऊपरी भाग में बाँस के टुकड़े क्रास करके बांध दिए जाते हैं तथा नीम के डारा से सजा दिया जाता है, यह मांगलिक प्रवेश द्वार हलबा समाज की विशिष्ट पहचान है।
बाजे-गाजे के साथ पूजा सामाग्री लेकर महिलायें मूड़ा परघाने के लिये निकल पड़ती हैं। ढेंड़हा नयी धोती कंधे में डालकर चलने लगता है। बस्ती के प्रवेश द्वार पर मुड़ा की विधिवत पूजा की जाती है। बढ़ई छोल चांचकर मूड़ा को कलात्मक रूप देता है तथा महिलायें रंगों से मूड़ा के सौन्दर्य को निखारती हैं मड़वा में कलात्मक रूप से सजा हुआ कलश स्थापित किया जाता है, जिसकी अखण्ड ज्योति विवाह के समापन तक प्रज्वलित रहती है।
दादा जी हलबा समाज में लकड़ी का ही मूड़ा क्यों प्रचलित है, इसके पीछे भी कोई विशेष बात अवश्य होगी।
तुम्हारा सोचना बिलकुल सही है, चीनू। पाण्डव लोग वनवास में थे, वनवास काल में विवाह का आयोजन करना पड़ा, धर्मराज युधिष्ठिर ने महाबली भीम को जंगल से मूड़ा लाने का निर्देश दिया, भीम जंगल से चार नामक वृक्ष ही पूरा काटकर ले आया और मंडप में उल्टा गड़ा दिया, तभी से यह हमारी परंपरा में शामिल हो गया है। मूड़ा उल्टा ही गड़ाया जाता है, चार का वृक्ष न मिलने पर आंवला, महुआ, रोहिना, डूमर आदि का भी प्रयोग किया जाता है।
मड़वा छाने के लिये बस्ती के बाहरी भाग से आम रास्ते से मिट्टी उठायी जाती है, इसे चूलमाटी कहते हैं, ढेंड़हा सब्बल लेकर चलता है, स्थान विशेष पर पूजा अर्चना की जाती है, ढेंड़हा सब्बल से खुदाई करता है, ढेंड़हिन मिट्टी बटोरती है। महिलायें चुहलबाजी करते हुये ............. तोला माटी कोडे ला, तोला माटी कोडे़ ला नइ आवे मीत, धीरे-धीरे, धीरे-धीरे .........................................गाती हैं।
मंडप अब पूरी तरह बनकर तैयार हो चुका है तथा तेल हरदी चढ़ाने की तैयारी होने लगती है, अतः इसके पूर्व गाँव की डिहवारिन दाई शीतला माता के मंदिर में करसा मौर तेल हरदी चढ़ाकर माता की मनौती की जाती है। प्रथम तेल हरदी माता को चढ़ाकर विनती की जाती है कि घर मे आयोजित शुभ मंगल कार्य में कोई विघ्न बाधा न आवे माता का आशीर्वाद लेकर घर लौट आते हैें।
रात्रि में प्रथम तेल माई घर में चढ़ता है इसे चोर तेल कहते हैं, ईष्ट देवी की पूजा अर्चना के पश्चात बिना मौर बांधे कमरे के अंदर चोर तेल चढ़ता है, इसके पश्चात मंडप में तेल चढ़ता है और रात में मायन नाचा होता है। घर में मड़वा गड़ा हो और महिलायें चुप रहें ऐसा हो ही नहीं सकता, महिलाओं द्वारा सुमधुर मांगलिक गीत ...........’’मड़वा में दुलरू हो हरिहर, हरिहर, हो हरिहर हरिहर, एक तेल चढ़गे ............... हो हरिहर हरिहर .................... के साथ बिहाव के मड़वा में अलग ही समा बंध जाता है, स्त्री पुरूषों के पाँव थिरकने लगते हैं। हरदी पानी के साथ पूरा मड़वा घर रोमांचित हो जाता है मांदर के थाप व मोहरी के धुन में थिरकते पूरा माहौल हरदी पानी व लोक संगीत के धुन में सराबोर हो जाता है।
बारात परघौनी के पूर्व कनकन का रस्म पूरा कर लिया जाता है तथा परघौनी के बाद दुल्हन का तेल उतारा जाता है। वर पक्ष में बारात प्रस्थान के पूर्व कनकन व तेल उतारने का काम पूरा हो जाता है। महिलायें बारात प्रस्थान के पूर्व मंडप में ही दुल्हे का मौर सौंपती है। ज्योति कलश लेकर वर की परिक्रमा करती हैं तथा मौर सौंपते हुए शुभाशिष प्रदान करती है।
बारात का शुभागमन होने पर एक निश्चित स्थान पर बरातियों को अस्थाई डेरा दिया जाता है। वधु पक्ष वाले सदल बल नाते-रिस्तेदारों के साथ सज-धज कर बाजे-गाजे के साथ बारात परघाने पहुँच जाते हैं दोनों पक्ष के समधी लोग पूजा अर्चना करते हैं और गले लगाकर उत्साह पूर्वक जोहार भेंट करते हैं। समधियों को हाथ में हाथ लेकर आदर-पूर्वक लिवा लाते हैं। बरातियों की रैली मड़वा छूने के लिये मड़वा घर की ओर मस्ती में झुम झुमकर नाचते गाते रवाना हो जाती है।
मड़वा घर के प्रवेश द्वार पर दो कन्यायें जल कलश लिये खड़ी रहती हैं, दो युवतियाँ हाथों में पर्रा लिये वर को मड़वा छूने से रोकने का असफल प्रयास करती हैं। दुल्हा राजा तेंदुसार या शीशम की चमचमाती लाठी से मड़वा छूने में सफल हो ही जाता है फिर वह नेंग स्वरूप स्वेच्छा से जल-कलश में सिक्का डाल देता है। इसी अवसर पर आरती व अक्षत द्वारा वर का स्वागत कर इच्छानुसार भेंट देती है तत्पश्चात दुल्हा राजा अपने डेरा में वापस चला जाता है।
इधर बारातियों के लिये भोजन की तैयारी होने लगती है और उधर महिलायें लाल भाजी के लिए दुल्हा डेरा पहुँच जाती हैं। यह एक मनोरंजक प्रसंग होता है। जहाँ वधु की सहेलियाँ हास-परिहास द्वारा भाटो को तौलने का प्रयास करती हैं। चतुर दुल्हा राजा भी इन कुड़ियों के इरादों को भांपते हुए सवा-शेर बनकर कुशल भाटों होने का संकेत दे ही देता है। हंसी-ठिठोली के बीच लाल भाजी का यह नेंग सम्पन्न हो जाता है।
’’दादा जी यह बतलाइए कि दुल्हा की वेशभुषा कैसी होनी चाहिए’’ चीनू भाई हमारे हलबा समाज में मांगलिक अवसरों पर पारम्परिक परिधानों का ही प्रयोग किया जाता है। भांवर के समय दुल्हा राजा धोती कुर्ता पगड़ी और छिन्द के मौर में सजे रहते हैं।
भांवर के लिये दुल्हा के मड़वा घर में आने के पूर्व ही दुल्हन की वस्त्राभूषण साज-श्रृंगार मौर आदि मड़वा घर में बाजे-गाजे के साथ पहुँचा दिया जाता है, जोशी जी के मार्गदर्शन में भांवर की तैयारी होने लगती है। दुल्हा और दुल्हन सज-धज कर मंडप में पहुँच चुके हैं। ढेंड़हा और ढेंड़हिन अपने पक्ष के दुल्हा और दुल्हन को उचित समझाईश देते हैं। जोशी जी लगिन चउंर दुल्हा दुल्हन के हाथों में देकर मुट्ठी में कैसे सम्भाल कर रखें ? ये आवश्यक हिदायत देते हैं। दुल्हा और दुल्हन आमने-सामने मुँह करके खड़े हो जाते हैं और बीचों-बीच वधु पक्ष द्वारा प्रदत्त पिछोरी को पर्दे की तरह लेकर दो लोग खड़े हो जाते हैं। जोशी के द्वारा इशारा करते ही पिछोरी का पर्दा सरक जाता है, वर-वधु पवित्र लगिन चउंर एक-दूसरे की ओर फेंकते हैं। शीघ्रतापूर्वक वर, वधु की ऊँगली पकड़कर खड़ा हो जाता है। लगिन (पाणिग्रहण) का रस्म होते ही उपस्थित लोगों में हर्ष की लहर दौड़ने लगती है। तत्पश्चात् भांवर प्रारम्भ हो जाता है, वर-वधु मड़वा के चारों ओर परिक्रमा करते हुए सात फेरे पूर्ण करते हैं। गृहस्थ रूपी चक्रव्यूह के सातों दरवाजोें को सात फेरों द्वारा पार किये जाते हैं या युं कहे कि सात फेरों द्वारा सातों वचन पूरा करने का संकल्प लेते हैं ............. ’’सात पीढ़ी का सजन होकर इन्द्र धनुषी छटा बिखरती रहे’’ मन में ऐसी साध लिए सातों परिक्रमा पूरी करते हैं।
अब बारी आती है धरम-टीका की, सर्वप्रथम माता-पिता आते हैं, जल और दूध से वर-वधु का पाँव पखारते हैं, बारी-बारी से अक्षत-चावल का टीका लगाकर बेटी को अपनी हैसियत के मुताबिक जो देना होता है, उसे अर्पित करते हैं। इसी क्रम में चाचा-चाची, मामा-मामी आदि भी धरम-टीका कर वर-वधु को अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं धरम-टीका के अवसर पर महिलाओं द्वारा गाया जाने वाला यह गीत वातावरण को और भी ज्यादा मर्मस्पर्शी बना देता है ...............................
’’इहि धरम-धरम गा, अगा मोर ददा फेर धरम नई तो पाबे गा, अवो मोर दाई, फेर धरम नई तो पाबे ओ .............................................’’
शादी का रस्म पूरा होने के पश्चात भोजनोपरांत बिदाई का रस्म पूरा किया जाता है। बांस से बनी झांपी में वधु की रसोई के लिए आवश्यक जोरन रखा जाता है, वधु के साथ ही साथ यह जोरन भी विशेष सावधानीपूर्वक सम्हाल कर ले जाते हैं। बारात वापस आने पर गाँव में किसी उचित स्थान पर वर-वधु व लोकड़ाहिन आदि को ठहरा दिया जाता है, उधर मण्डप वाले घर में आँगन को गोबर से लिपकर चैक पुर दिया जाता है। घर की महिलाएं नहा-धोकर, सज-धज कर तैयार हो जाती हैं, बहु के रूप में लक्ष्मी साक्षात् प्रकट होकर प्रथम गृह-प्रवेश करने जा रही है, अतः महिलायें आरती सजाकर उस क्षण की बेसब्री से प्रतीक्षा करती हैं, उसी दिन दोपहर पश्चात वधु पक्ष के लोग चैथियां आते है, इसका विशेष महत्व है। चैथिया के माध्यम से समधिनों का मेल-मुलाकात, जोहार भेंट तथा बेटी का घर देखने का सुअवसर मिलता है, अतः यह चैथिया का नेंग विवाह का आवश्यक व महत्वपूर्ण नेंग माना जाता है। ढलती बेरा में चैथियां की परघौनी विवाह रस्मों के सुखद समापन का शुभ संकेत देती है। सूरज ढलने के पश्चात मण्डप में धरम-टीका का आयोजन किया जाता है, वर के माता-पिता, चाचा-चाची, मामा-मामी आदि नाते-रिस्तेदार दो बीजा चउंर टिककर वर-वधु को अपना असीम आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
बिहाव झरने के बाद शुभ दिन देखकर अरवाचउंर खाने का कार्यक्रम तय किया जाता है, यह मुख्यतः पारिवारिक रस्म है जिसमें परिवार की ईष्ठ देवी देवताओं की पूजा होती है तथा बहु को इस परिवार के नए सदस्य के रूप में सम्मिलित किया जाता है। सामान्यतः समान गोत्रज वाले ही अरवाचउंर में शरीक होते हैं। देवी को अर्पित कलेवा के भोग का प्रसाद सबको परोसा जाता है, नई बहु सभी सदस्यों को भोजन परोसती है तथा संकल्प करती है कि वह ऐसे ही आतिथ्य-सत्कार कर परिवार की मान मर्यादा की रक्षा करती रहेगी।
इति श्री
आलेख
मन्नू लाल ठाकुर
पिद्दा बाड़ा, ग्राम - मनौद
पो. - तरौद (बालोद)
जिला - दुर्ग, छत्तीसगढ़
प्रस्तावना
साहित्य समाज का दर्पण है, संप्रति ’’कुर्यात् सदा मंगलम’’ के माध्यम से हलबा समाज के वैवाहिक - सांस्कृतिक क्रियाकलापों पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है। परिवर्तन के दौर में बाह्य शक्तियाँ अतिक्रमण कर सभ्यता और संस्कृति को प्रदूषित करने का भरसक प्रयास करती हैं, ऐसे समय में अपनी सभ्यता और संस्कृति का समुचित ज्ञान ही अस्तित्व की रक्षा में सही मददगार हो सकते हैं। स्वामी विवकानंद का कथन है - ’’ ज्ञदवू ज्ीलेमस ि’’ अर्थात् अपने आपकों जान लेने के पश्चात ही व्यक्ति परिवार और वृहत समाज की पहचान कर पाता है।
अस्तु यह लेख उन नौनिहालोें को समर्पित है, जिनके ऊपर समाज का भरपूर विश्वास है कि वे परिवार व समाज का कुशल नेतृत्व कर अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का सही निर्वहन करेंगे।
मनौद
अक्षया तृतीया - 2008 मन्नू लाल ठाकुर
कुर्यात् सदा मंगलम
पोस्टमेन, पोस्टमेन !
चीनू भाई कहानी सुनने में तल्लीनता से लगा हुआ था, पोस्टमेन की आवाज सुनकर हमने चीनू भाई से कहा - चीनू भाई देखो तो पोस्टमेन आया है, दौड़कर जाओ।
छः वर्षीय चीनू भाई क्लास टू का छात्र है, शहर में पढ़ता है, अवकाश मिलने पर वह बिना नांगा किए दादा-दादी के पास गाँव आ जाता है। ऐसे ही वह गाँव आया हुआ था और दादा से अपनी मनपसंद कहानियाँ सुनने में लगा हुआ था।
चीनू चहकते हुए वापस आया, उसके हाथ में शादी का निमंत्रण पत्र था, जोशिले स्वर में चिल्लाकर बोला - दादा जी आपके लिए बिहाव का नेवता आया है।
हमने पूछा - तुम्हें कैसे मालूम ? ’’ देखो तो सही इसमें लिखा है - शुभ-विवाह, मैंने ठीक कहा न।
हाँ भई, आपने बिलकुल ठीक कहा।
.............. कुछ पल सोचने के बाद चीनू दार्शनिक अंदाज में पूछता है - दादाजी ये विवाह क्या होता है और क्यों होता है ?
चीनू भाई पहले ये बताओ तुम्हारी कहानी अधूरी है, उसे पूरी करूँ या विवाह के बारे में बताऊँ।
दादाजी कहानी तो सुनते रहते हैं, पहले आप विवाह के बारे में बतलाइए।
ठीक है हम आपको विवाह के बारे में ही बतलाते हैं, मगर हाँ एक शर्त पर।
क्या है , वो शर्त ?
यह कि आप सोना मत।
यह कहानी थोड़ी न है कि मैं कहानी सुनते-सुनते सो जाऊँ, आप बताओ तो सही।
चीनू छः साल का बालक है, उसकी बाल सुलभ जिज्ञासा को देखकर मेरा भी मन उसकी जिज्ञासा के लहलहाते पौधों में जल सिेंचन का होने लगा। हमने निश्चय कर लिया कि आज चीनू को विवाह का सारा ज्ञान-कलेवा अवश्य परोसा जावे।
चीनू भाई सुनो यह प्रकृति का सास्वत नियम है दो अनजान युवक और युवती प्रकृति के विकास क्रम में अपना सहयोग प्रदान करने हेतु परिवार और समाज की सहमति और सानिध्य में परिणय सूत्र में बंध जाते हैं और आजीवन एक दूसरे का साथ निभाने का संकल्प लेते हैं , उसे मंगल परिणय कहते हैं। विवाह एक संस्कार है समझौता नहीं और यहीं से व्यक्ति के गृहस्थ जीवन की शुरूवात होती है।
दादा जी आपकी यह बात कुछ-कुछ मेरी समझ में आ रही है, पूरी नहीं। खैर कोई बात नहीं जब बड़ा हो जाऊंगा तो सब समझ जाऊंगा। अच्छा ये बतलाइए विवाह कब करना चाहिए ?
चीनू भाई आपने बहुत ही सुन्दर सवाल पूछा है।
मैं बहादुर बच्चा हूँ न, बहादुर बच्चे हमेशा अच्छी बात करते और अच्छा सवाल ही पूछते हैं। ............. बातों ही बातों में टालिए मत, मैंने जो पूछा है वह बतलाइए।
हाँ, चीनू भाई सुनो - सरकार के नियमानुसार लड़कियों के लिए 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष विवाह हेतु न्यूनतम आयु निर्धारित है।
यह तो सरकार का नियम है, आप भी तो बुजूर्ग हैं, अनुभवी हैं, ज्ञानवान हैं, आप क्या सोचते हैं, आप अपना विचार भी बतलाइए न - चीनू कहने लगा।
चीनू भाई हमारा ख्याल है - लड़कियों की शादी 21 वर्ष और लड़कों की शादी 25 वर्ष से पूर्व न हो। पूर्ण परिपक्वता आने पर ही विवाह होने पर स्वस्थ संतानो की उत्पत्ति होगी तथा इस आयु के पश्चात विवाह होने पर युवक भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर रोजगार के क्षेत्र में आत्म निर्भर हो जावेंगे। बढ़ती हुई जनसंख्या को भी नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।
हाँ, दादा जी कच्चा आम खट्टा होता है और अच्छा सा पका आम स्वादिष्ट। ............ मैंने ठीक कहा न।
बिलकुल ठीक कहा।
दादा जी आपने विवाह और विवाह के लिए उचित आयु की जानकारी दी, अब विवाह कैसे होता है, दो अनजान युवक और युवती एकाएक परिणय सूत्र में कैसे बंध जाते हैं - ये सब जानने के लिए मेरा मन मचल रहा है, आप सारी बातें विस्तार से बतलाइए।
चीनू भाई समाज काफी विस्तृत और व्यापक है, यह दूर-दूर तक फैला हुआ है, परिवार उसकी एक इकाई है। समाज में पारिवारिक नाते-रिस्तों का ताना-बाना फैला हुआ है, समाज के लोग नाते रिस्तों को जोड़ने में एक दूसरे की मदद करते हैं, सम्पर्क माध्यमों से विवाह का प्रस्ताव रखते हैं, सामाजिक सम्मेलनों में विवाह योग्य युवक-युवतियों का परिचय-कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, तथा उनका सचित्र बायोडाटा प्रकाशित किया जाता है। जिससे लोगों को वांछित वर-वधू तलाशने में मदद मिलती है।
दादा जी यह बतलाइए रिस्ता तय करने में किन-किन बातों का ध्यान रखा जाता है ?
चीनू भाई हलबा आदिवासी समाज की अपनी अलग पहचान है और इस पहचान को बनाए रखने के लिए हलबा समाज कटिबद्ध है। सर्वप्रथम रिस्ता का पहल गोत्रज से प्रारंभ होता है। लड़की और लड़का दोनों के मातृ पक्ष और पितृ पक्ष के गोत्रज का मिलान किया जाता है। चारों में से किसी एक का समान गोत्रज होने पर वैवाहिक रिस्ता नहीं हो सकता, वहाँ भाई बहन का रिस्ता बनता है। रिस्ता तय करने हेतु यह पहली सीढ़ी है। चीनू भाई मैं तुम्हें बताना चाहूंगा कि हलबा समाज में प्रचलित यह सामाजिक अवधारणा विज्ञान सम्मत है क्योंकि सिफलिस नामक महारोग के प्रकोप से समाज को सुरक्षा प्रदान करता है। निकटतम रिस्तेदारी में विवाह सम्बंध सिकलिन नामक महादैत्य को आमंत्रित करता है।
हलबा समाज रिस्तों की पवित्रता और मधुरता को महत्व देता है। दो सगी बहनों के सगी देवरानी और जेठानी होने की अनुमति नहीं देता समाज।
दादा जी आप यह बतलाइए कि समाज ने एैसा नियम क्यों बनाया होगा ?
चीनू भाई हमारे पूरखा लोग वैज्ञानिक सोच रखते थे। जैसे विज्ञान में क्यों, क्या, कैसे आदि प्रश्नों का समााधान खोजा जाता है, वैसे ही हमारे सामाजिक चिन्तक पारिवारिक सुख और शांति के बारे में चिन्तनशील थे। महिलाओं के तीजा पर्व का विशेष महत्व होता है, महिलायें उस दिन मायके में रहकर पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं और इससे बढ़कर दूर-दराज गयी अपनी बहनों से मायके में भेंट होने का और मिल जुलकर बतियाने और व्रत रखने की सुखद अनुभूति जो होती है वैसा सुखद पल और कहीं नहीं होता। सगी बहनों के परस्पर देवरानी-जेठानी बनने से दो बहनों का पवित्र प्यार जहरीला बन जाता है। हमारे सामाजिक मनीषी इस तथ्य से भली भाँति परिचित थे कि बहनों का पवित्र प्रेम देवरानी-जेठानी के डाह में जलकर राख न हो जाय।
दादा जी हमारे पुरखा लोग क्या गजब का दिमाग रखते थे।
हाँ चीनू वे लोग पढ़े लिख नहीं थे, न ही आज की तरह सुविधायें थी किंतु वे ज्ञानमार्गी और कर्ममार्गी थे। उनका चिन्तन छल-कपट से रहित सार्थक और व्यावहारिक हुआ करता था तभी तो उनके द्वारा प्रतिपादित रीति-रिवाज व परम्परायें आज भी मान्य और प्रचलित हैं।
दादा जी रिस्ता बनाने में और किन-किन बातों को देखना चाहिए ?
चीनू भाई आपने बहुत ही सुन्दर सवाल किया है।
दादा जी आप बार-बार यही रट लगाए रहते हैं, अच्छा सवाल किया है - अच्छा सवाल किया है। अरे अच्छा सवाल किया तो अच्छा सा जवाब दो न।
हाँ चीनू भाई सुनो - हमारे पुरखे लोग कहते थे - ’’पानी पियो छान के और बेटी लो, दो जान के’’ - क्या समझे ?
’’गंदा पानी पीने से व्यक्ति बीमार हो जाता है’’ - और क्या ? वैसे ही गलत जगह रिस्ता होने से परिवार बीमार हो जाता है अर्थात पारिवारिक कलह से परिवार तबाह हो जाता है।
चीनू भाई ये तो रही हमारी सामाजिक परम्पराओं से सम्बंधित बातें। आज हमारी सोच और विचारों में जटिलतायें समा गई हैं, हम किंकत्र्तव्य की स्थिति में हैं। विचारों के इस भंवरजाल में विवेक रूपी पतवार से ही हम उफनती दरिया को पार कर सकते हैं।
’’वो कैसे ?’’
वो ऐसे - हमारे पूर्वजों की जीविका का प्रमुख साधन कृषि, अब परिवार बढ़ने के साथ-साथ सिमट कर रह गयी है, जनसंख्या बढ़ी कृषि जमीन घटी, फलस्वरूप जीवन संघर्षशील हो गया है। कृषि के सिवाय अन्य उद्य़मों के प्रति हम नितांत उदासीन हैं। अतः हम अपना भविष्य सरकारी नौकरियों में तलाश रहे हैं, जहाँ बैठे बिठाये नियमित आय होती रहे। सरकारी नौकरी के अभाव में जीविका का अन्य विकल्प हमारे पास नहीं है। आर्थिक सुरक्षा की चिन्ता उच्च शिक्षा प्राप्त संतानें, यही सब सामाजिक समस्या बनती जा रही है। शिक्षा है तो रोजगार नहीं, रोजगार है तो आर्थिक सुरक्षा नहीं। अतः माता-पिता यह निर्णय नहीं कर पा रहे हैं कि रिस्ता कहाँ बनावें। चतुर नाविक उफनती दरिया को अपने विवेक से पार कर जाता है, वैसे ही विवेकशील माता-पिता अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त संतानो के लिये स्वरोजगार व सही समय में सुखद गृहस्थ की व्यवस्था कर सकते हैं।
दादा जी ठोस-ठोस बातें आप संक्षेप में बताओ न ?
हाँ चीनू मैं वही बताने जा रहा हूँ। रिस्ता जोड़ने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, पारिवारिक संस्कार ये प्रमुख बातें हैं। सूरत के बजाय सीरत तथा रूप के बजाय गुण अधिक महत्वपूर्ण है। रिस्ता बनाने में मानसिक हीन भावना की दीवार खड़ी न करें, धन और पद का अहंकार न पालें। झोपड़ी को हवेली बनने में और हवेली को ढहने में कोई समय नहीं लगता इसलिए चीनू भाई जहाँ चाह वहाँ राह, ’’कर्मण्ये वाधि कारस्ते मा फलेषु कदाचन’’ का अनुसरण करें।
दादा जी आपने रिस्ता तय करने में आवश्यक जानकारी व दिशा निर्देश दिये, अब यह बतलाइए कि सामाजिक परम्परानुसार आगे किन बातों का अनुसरण किया जाना चाहिए क्योंकि मेरी जिज्ञासा उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है, अब सारी बातों का, रस्म रिवाजों को विस्तार से बताकर मेरी जिज्ञासा शांत कीजिए।
चीनू भाई, जन्म से लेकर गृहस्थाश्रम में प्रवेश के पूर्व तक का समय शिक्षा ग्रहण करने, कठिन तप और साधना करने का होता है। इस अवस्था में व्यक्ति कठिन तपस्या और साधना में जितना समय देता है, गृहस्थाश्रम व उसके आगे का जीवन उतना ही सुखद मीठा फल देने वाला होता है। यदि गुलाब का फूल पाना चाहते हो तो गुलाब का कलम लगाना होगा, बेसरम का कलम लगाकर गुलाब का फूल हासिल नहीं कर सकते।
हलबा समाज का समूचा सामाजिक ढांचा एक मजबूत बुनियाद पर टिका है। समाज के रीति-रिवाज व प्रचलित परिपाटियों में समयानुकूल बदलाव की अनुकूलता है। नियम-कानून-कायदे जितने कठोर होते हैं वह समाज के विकास में उतना ही अवरोध का काम करता है और ऐसा समाज सामाजिक विघटन और बिखराव झेलने के लिये मजबूर हो जाता है। हमारे हलबा समाज की पुरातन परिपाटियों में आंशिक संशोधन कर अद्यतन परिवेश में स्वीकार्य किया गया है। बाह्य कलेवर में बदलाव तो आया है, किन्तू मूल सामाजिक पहचान को यथावत बनाए रखने का भरसक प्रयास किया गया है। सामाजिक परिवर्तन के दौर में बाह्य शक्तियाँ अतिक्रमण का पुरजोर प्रयास करती हैं, संप्रति सामाजिक संस्कृति के सम्पूर्ण संरक्षण के लिए सशक्त मानसिकता अति आवश्यक होती है। हमें अपनी सांस्कृतिक शोध व विरासत को संरक्षित बनाए रखने के लिये विवेकशील चिन्तन, गहन अनुसंधान की आवश्यकता है, अतः सामाजिक-सांस्कृतिक अध्ययन केन्द्र स्थापित कर अनवरत चिन्तन व मनन द्वारा सामाजिक परम्पराओं की वैज्ञानिकता को सर्वसमाज के सम्मुख प्रकट कर हम अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता को प्रतिपादित कर सकते हैं।
दादा जी ओर ऐसी कौन सी प्रथा है जिसमें रिस्ता बनाने के लिए लड़की का लेना देना होता है?
चीनू भाई हमारे ही हलबा समाज में गरियाबंद, नगरी, सिंहावा के वनांचल में एक विचित्र प्रथा है जिसे हमारे बालोद क्षेत्र में सपने में भी सोच नहीं सकते।
ऐसी कौन सी विचित्र प्रथा है, दादा जी जिसे हम सपने मंें भी सोच नहीं सकते आप जल्दी से बतलाइए और मेरी जिज्ञासा शांत कीजिए।
उन क्षेत्रों में मामा और बुवा की संतानों का परस्पर वैवाहिक रिस्ता हो सकता है, किन्तु हमारे यहाँ भाई-बहन के पवित्र रिस्ते को तिलांजलि देकर परस्पर शादी की बात सपने में भी नहींे सोच सकते।
दादा जी ऐसी उल्टी गंगा वहाँ क्यों बह रही है, इसका कारण स्पष्ट कीजिए।
सिंहावा नगरी, प्राचीन ऋषि मुनियों की तपोभूमि है, सघन वनों से आच्छादित, उच्च पर्वत मालाओं से घिरा यह अरण्य क्षेत्र सर्वदा दुर्गम रहा है। यातायात व संचार साधनों के अभाव के कारण अन्य क्षेत्रों से उनका सम्पर्क नगण्य था। सीमित जनसंख्या व दुर्गम भौगोलिक संरचना के कारण निकटतम रिस्तेदारी में वैवाहिक सम्बंध बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा होगा, किन्तु अब शिक्षा और संचार साधनों के विकास के साथ ही उनका सम्पर्क अन्य क्षेत्रों से होने लगा है, संप्रति इस प्रथा के प्रति लोगों में अनइच्छा व उदासीनता देखी जा रही है।
दादा जी ऐसी ही कोई विचित्र प्रथा प्रचलित हो तो उसके बारे में भी बतलाइए।
हाँ चीनू सूनो - ऐसी ही एक प्रथा का नाम है गुरावट। यह प्रथा हलबा समाज में न तो प्रचलित है और न ही मान्य है क्योंकि इस प्रथा में दोनों ही पक्ष एक-दूसरे को अपनी-अपनी लड़की देने की शर्त रखते हैं। प्रायः आगे चलकर दोनों परिवारों के बीच आपसी सम्बंधो में कड़ुवाहट आने से वैमनस्यता की आशंका बढ़ जाती है। अतः हमारे मनीषियों ने दूरगामी दुष्परिणामों को पहले ही सोचकर ऐसी प्रथा को समाज से सर्वथा दूर ही रखा। क्यों चीनू भाई, मान गए न हमारे पूर्वज कितने ज्ञानी थे। इसीलिए मैं कहता हूँ, हमारी समाज व्यसस्था की जड़ अत्यंत मजबूत है। सजन सात पीढ़ी के लिए बनता है, अतः जो भी निर्णय लिये जाते हैं, सोच समझ कर लिये जाते हैं। हमारे पूरखों का चिन्तन सतही नहीं था, वे दूर तक सोचते थे। उनकी सोच का मीठा फल आज हमको चखने को मिल रहा है। हमारी हलबान संस्कृति के संबंध में यह उक्ति चरितार्थ होती है - ’’कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ............’’
’’कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ............’’ वाह ! क्या कहने ! दादा जी , ऐसे ही कुछ रोचक प्रसंग और बतलाइए।
अनुशासित आदि संस्कृति का धारक हलबा समाज गहन अनुसंधान के लिए खुला आमंत्रण देता है। इसी क्रम में एक रोचक प्रसंग और सुनाता हूँ। चीनू भाई तुम्हें हलबा समाज के सांस्कृतिक समुंदर में गहन गोता लगाना होगा।
हाँ-हाँ दादा जी मैं बिलकुल तैयार हूँ, आप आगे-आगे चलिए, पीछे मैं हूँ।
हाँ, तो सुनो, भाभी की बहन या भाई से तथा जीजा के भाई या बहन से विवाह नहीं हो सकता अर्थात समधी या समधिन से वैवाहिक सम्बंध समाज में बिलकुल स्वीकार्य नहीं है। यही कारण है अनुशासन बद्ध हलबा समाज अपनी अस्मिता की रक्षा करने में बिलकुल सफल रहा है। चीनू भाई , आपने रामायण पढ़ा है।
हाँ-हाँ, हमने पढ़ा है - भगवान राम, लघु भ्राता लक्ष्मण, माता सीता तथा राम भक्त हनुमान इनको कौन नहीं जानता। पूरी दुनिया जानती है। .............. दादा जी ऐसा लगता है आप कोई पहेली बुझा रहे हैं, है न यही बात।
चीनू भाई तुम्हारा अनुमान बिलकुल सही है। भगवान राम के वनवास काल की बात है, जब भगवान राम और लक्ष्मण स्वर्ण मृग का शिकार कर पर्णकुटीर में वापस लौटे तो माता सीता कुटिया में नहीं थी। भगवान राम ने लक्ष्मण से कहा - भाई सीता कहाँ चली गई, किसने उसका हरण किया, उन्हें खोजो। तब भाई लक्ष्मण ने निवेदन किया, भैया मैंने भाभी सीता के मुख-कमल का कभी दर्शन नहीं किया है, मैं उन्हें कैसे पहचानूंगा। मैंने हमेशा भाभी के चरण कमलों की पूजा की है। ................ चीनू भाई, हलबा समाज में भाभी का स्थान माता के तुल्य माना गया है। अतः भाभी को चुड़ी नहीं पहना सकते, अर्थात भाभी को पत्नी के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती। ’’यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते तत्र रमन्ते देवताः’’ हलबा समाज में जन्म देने वाली माता तथा काकी, भाभी, भांजी तथा छोटी बहन आदि को मातृ देवी के रूप में, इनकी आराधना की जाती है, तभी तो देवर - देवता के समान उस घर में वास करता है।
दादा जी इसका मतलब हुआ कि हलबा समाज में नारी को बहुत ऊँचा स्थान दिया गया है।
हाँ, चीनू बिलकुल सही कहा तुमने। माँ-दुर्गा, माता दन्तेश्वरी के रूप में हमारी आराध्य है, जगदम्बे माँ भवानी माता शक्ति और लक्ष्मी के रूप में साक्षात प्रगट है। नारी शक्ति अपने विविध रूप और नाम से नानाविध लीला करती है, बहु, बेटी, बहन, भार्या, माता आदि रूपों में पुरूषों के समीप रहकर पुरूष के पुरूषार्थ को प्रोत्साहित करती है। माता केवल देती है, बदले में कुछ नहीं लेती, इसीलिए तो कहा गया है - ’’अबला, हाय तेरी यही कहानी, आँचल में दूध और आँखों में पानी।’’
चीनू भाई, तुमको नींद तो नहीं आ रही है।
वाह ! दादा जी मुझे क्यों नींद आने वाली, आपको आ सकती है, क्योंकि आप बोलते-बोलते थक गए होंगे। मुझे तो बड़ा आनंद आ रहा है।
अच्छा तो सुनो। समाज में एक प्रथा और है, उसे कहते हैं - बरेंडी। यह दो प्रकार की होती है - पहला - जियत बरेंडी और दूसरा मरे बरंडी। इसे कान लगाकर सुनना, यह अति गंभीर विषय है। शादी का रस्म पूरा होने पर, कन्या की बिदाई (गवना) का नेंग पूरा कर दिया जाता है, परिस्थितिवश कन्या गवना का नेंग पूरा होने के बावजूद अभी पिता के घर से पति गृह (ससुराल) नहीं पहुँच पाई है और कोई दुखद घटना हो जाती है - यथा नवविवाहित पति का आकस्मिक निधन, तो ऐसी स्थिति में नवविवाहिता विधवा नहीं कहलाएगी तथा हाथ की चूड़ी नहीं फूटेगी। अस्तु वह कन्या मरे बरेंडी कहलाएगी। इसी प्रकार कन्या के प्रथम ससुराल जाने से पूर्व यदि वधु पक्ष और वर पक्ष में कुछ गंभीर कारणों से मतभेद उत्पन्न हो जाता है, यथा - लड़का नशेड़ी है, व्यभिचारी है, अपराधी है, असाध्य रोगों से पीड़ित है आदि। ऐसे संगीन आरोपों के आधार पर यदि माता-पिता अपनी कन्या को भेजने से मना कर दें अथवा वर पक्ष कन्या ले जाने से मना कर दें तो समाज का न्याय , विभाग इन आरोपों की सूक्ष्मता से जाँच पड़ताल करता है। आरोप सही साबित होने पर लड़की जियत बरेंडी घोषित कर दी जाती है तथा पूर्व विवाहित पति के पास लड़की न भेजकर लड़की के माता-पिता व समाज को निर्देशित किया जाता है कि योग्य वर मिलने पर सामाजिक नियमानुसार अन्यत्र अपनी कन्या का विवाह कर सकते हैं।
बरेंडी कन्या (दोनों) का विवाह समाज की उपस्थिति में अत्यंत सादे समारोह में सम्पन्न होता है, जिसमें वर पक्ष बारात लेकर कन्या घर आता है, कन्या की मांग करता है, चूड़ी पहनाता है, और कन्या को पत्नी के रूप में वरण करता है।
हलबा समाज में स्त्री और पुरूष दोनों को समान दर्जा दिया गया है। किसी महिला के विधवा हो जाने पर यदि वह महिला पुनर्विवाह करना चाहती है तो समाज उसे सहर्ष अनुमति प्रदान करता है। विधवा विवाह में भी बरेंडी विवाह की तरह वर पक्ष बारात लेकर आता है, माँग में सिंदूर भरता है, चूड़ी पहनाता है और विधवा महिला को समाज की उपस्थिति में अपनी पत्नी के रूप में अंगीकार करता है।
इसी प्रकार पति के जुल्म से पीड़ित अथवा पति के नशेड़ी, अपराधी, व्यभिचारी अथवा स्वास्थ्यगत कारणों से पति का त्याग कर अथवा पति द्वारा त्यागे जाने पर कोई महिला अपने माइके में आ जाती है तो वह छड़वे कहलाती है। उसे भी सामाजिक परम्परानुसार दूसरा पति वरण करने का अधिकार है।
दादा जी हमारे दोस्त लोग खेल-खेल में कुछ बदमाशी करते हैं, कोई गेंद छिपा देता है, कोई किसी को मार देता है, कोई किसी को गाली बक देता है, क्या समाज में भी ऐसी हरकतें होती हैं ?
समाज एक पवित्र संस्था है, यहाँ सबको समान अवसर मिलते हैं। फिर भी कुछ लोग समाज की मुख्य धारा से भटक जाते हैं और ऐसे कृत्य कर बैठते हैं जो समाज में प्रचलित परम्पराओं के सर्वथा प्रतिकूल होते हैं। बगीचा में पौधों को एक समान खाद पानी दिया जाता है, फिर भी कुछ पौधे विकास में पिछड़ जाते हैं, रोगग्रस्त हो जाते हैं। अतः अविकसित तथा रोगग्रस्त पौधों को अतिरिक्त देखरेख व उपचार की जरूरत होती है। ठीक उसी प्रकार समाज में भी कुछ लोग असामाजिक कृत्य कर सड़ी मछली का कार्य करते हैं। एक सड़ी मछली से तालाब का जल प्रदूषित हो जाता है ठीक उसी प्रकार एक व्यक्ति के असामाजिक कृत्य से समाज व्यवस्था बाधित हो जाती है। चतुर माली रोगग्रस्त पौधे का त्वरित उपचार प्रारंभ कर देता है। आवश्यकता पड़ने पर उस पौधे को उखाड़कर नष्ट भी कर देता है, ठीक उसी प्रकार समाज में भी प्रकृति का यह शाश्वत नियम लागू होता है।
दादा जी आप तो नयी-नयी बातें बताकर मेरी जिज्ञासा बढ़ाते जा रहे हैं। समाज में ऐसे कौन से असामाजिक कृत्य हैं जो सड़ी मछली की तरह समाज-सरोवर के पवित्र जल को प्रदूषित करते हैं, शीघ्र बतलाइए ?
चीनू भाई ऐसा लगता है, तुमने आज खाना, खेलना, टी.वी. देखना सबको बाय कर दिया है।
दादा जी आप बात ही ऐसी बता रहे हैं कि अन्य बातों का कोई महत्व ही नहीं है। समाज के रोचक प्रसंग से बढ़कर दूसरा कोई हो ही नहीं सकता, ................ टालिए मत शुरू हो जाइए।
बगीचा में कितना अच्छा बीज डालते हैं, फिर भी खरपतवार पैदा हो ही जाते हैं, समाज में भी कुछ लोग खरपतवार की तरह ऊग आते हैं। प्रकृति ने दुर्जन और सज्जन दोनों तरह के इंसान पैदा किये हैं, सज्जन सही राह पर चलते हैं और दुर्जन उल्टी दिशा में चलते, सोचते और करते हैं, जब कोई युवक युवती समाज व्यवस्था को धता बताकर, अपना घर व परिवार त्यागकर घर बसाने की इच्छा मन में पालकर अन्यत्र भाग जाते हैं, तो इसे उढ़रिया ले जाना कहते हैं अर्थात समाज व परिवार की बिना सहमति से एक व्यक्ति अन्य युवती या महिला को उड़ाकर ले जाता है। उढ़रिया प्रथा को समाज द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है फिर भी समाज सामाजिक नियमानुसार इसका उपचार करता है।
जैसे उढ़रिया प्रथा एक सामाजिक कलंक है, वैसे ही पैठू प्रथा समाज में नासूर की तरह है। उढ़रिया की तरह पैठू की उत्पत्ति होती है। दो युवक युवती अथवा स्त्री पुरूष का अवैध प्रेम प्रसंग की अंतिम परिणति उढ़रिया या पैठू होती है। उढ़रिया में दोनों प्रेमी युगल घर और परिवार का त्यागकर अन्यत्र भाग जाते हैं तथा अज्ञातवास में रहते हैं। समाज को पता चलने पर सामाजिक कदम उठाया जाता है अथवा वे खुद समाज के शरणागत होकर आत्मसमर्पण कर देते हैं। पैठू में प्रेमिका अपने प्रियतम के घर आ जाती है अर्थात प्रेमिका प्रेमी के घर पैठारो ले लेती है। दोनों के परिवार वाले इस तथ्य को समाज के सामने रखते हैं या समाज स्वतः हस्तक्षेप कर सामाजिक पूछताछ कर सामाजिक परम्परानुसार उचित व्यवस्था देता है।
दादा जी आप यह बतलाइए कि लोग ऐसा दुस्साहस क्यों करते हैं, क्या उन्हें समाज के लोक लाज का किंचित मात्र भी भय नहीं रहता ?
इस प्रकार की सामाजिक अनुशासनहीनता के कई कारण हैं, यथा -
प्रथम - अशिक्षा से व्यक्ति कुंठित मानसिकता लिये विवेकहीन हो जाता है।
द्वितीय - दरिद्रता मानसिक हीन भावना के लिये उत्प्रेरक का काम करती है।
तृतीय - परिवार में सबल पारिवारिक नेतृत्व व मार्गदर्शन का अभाव परिवार को प्रदूषित होने व बिखरने से रोक नहीं पाता।
चतुर्थ - माता-पिता द्वारा अपनी संतान की बिना सहमति के अपने निर्णय को संतानों पर दबाव पूर्वक थोपना।
पंचम - दूरदर्शन द्वारा उत्तेजक सीरियलों का प्रसारण कर युवक-युवतियों में काम वासनाओं का भोंडा तरीके से परोसना व उत्तेजित करना।
षष्ठम - आयातित पाश्चात्य साहित्य, संगीत, संस्कृति, शिक्षा आदि का भारतीय जनजीवन में अंधाधूंध अतिक्रमण।
सप्तम - भारत के आध्यात्मिक परिवेश में पाश्चात्य भौतिकवाद का हस्तक्षेप।
अष्टम - आदिवासी अंचलों में प्रचलित शिक्षा पद्धति व व्यवस्था का दोषपूर्ण होना।
नवम् - आदिवासियों के प्रति शासन व प्रशासन द्वारा मानवीय आचरण का नितांत अभाव।
दशम - शासन के विकास कार्यक्रमों में आडंबर अधिक व क्रियान्वयन न के बराबर।
चीनू भाई ये कड़वे सच हैं जो आज हमारी समाज व्यवस्था, सभ्यता व संस्कृति पर महादानव बनकर लगातार हमला कर रहे हैं और हम निस्सहाय बनकर ठगे से रह गये हैं, सामाजिक संस्कृति पर कुठाराघात हमारे अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर रहा है।
दादा जी, यह तो भयावह स्थिति है, हमारा गौरवशाली अतीत, पलभर में धराशायी होता दिख रहा है।
नहीं चीनू, आशंकित होने की कोई आवश्यकता नहीं है। नयी पीढ़ी सुशिक्षित, सुसंगठीत और आत्मानुशासित होकर खड़ी हो चुकी है, हमारी सामाजिक व सांस्कृतिक बुनियाद मजबूत है, अतः क्षणिक झंझावात इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।
समाज अपने सामाजिक सदस्यों पर सूक्ष्म नजर रखता है, किसी भी सदस्य द्वारा चाहे वह पुरूष हो या महिला, अन्य स्त्री या पुरूष के साथ अनैतिक सम्बंध खोरभूल माना जाता है। समाज ऐसे सामाजिक मामलों की गहराई से जांच पड़ताल करता है और खोरभूल का आरोप सही साबित होने पर सामाजिक नियमानुसार व्यवस्था दी जाती है। खोरभूल एक अनैतिक आचरण है और समाज ऐसे घृणित आचरण को निरूत्साहित करने के लिये हमेशा प्रयत्नशील रहता है।
दादा जी, समाज में प्रचलित और ऐसी मान्यताएं जिसके बारे में नयी पीढ़ी अनभिज्ञ हो, उन पर प्रकाश डालिए।
सामाजिक रीतिरिवाजों, प्रथाओं और परम्पराओं से हमारी लोक संस्कृति पोषित होती है, समाज व्यवस्था इनसे अलंकृत होकर आलोकित होती है। हलबा समाज में दैवीय आस्था सर्वोपरी है। घटित होने वाली हर घटना में दैवीय कारक को विशेष महत्व दिया जाता है। स्त्री जाति के किसी
भी जातक के शारीरिक जख्म पर जीव पड़ जाने (कीड़े पड़ जाने) पर उसे दैवीय घटना मानी जाती है, और ब्याधिग्रस्त उस बच्ची, किशोरी, युवती अथवा स्त्री की पहचान फूलपरी के नाम से होती है। फूलपरी को लेकर शादी ब्याह में कोई परेशानी नहीं होती किन्तु माईघर में इसका प्रवेश वर्जित माना जाता है।
ऐसी महिला जिसका एक बार विवाह हो चुका है, किन्तु वह स्वतः या पति द्वारा त्यागे जाने पर दूसरा विवाह कर लेती है, वह दूधरी कहलाती है। इन्हें भी माईघर में प्रवेश नहीं दिया जाता। फूल परी व दूधरी महिलाओं की तरह विधवा महिलाओं को भी माईघर में प्रवेश नहीं दिया जाता, किन्तु माईघर से सम्बंधित विधवा महिलाओं के लिये यह बंधन लागू नहीं होता।
हमारे हलबा समाज में पितृ सत्तात्मक समाज व्यवस्था प्रचलित है। लड़कियाँ विवाहोपरांत माता-पिता का घर त्यागकर ससुराल में पति के घर अपना घर बसाती हैंै। विशेष परिस्थितियों में पुरूष अपना पैतृक घर छोड़कर ससुराल में अपनी पत्नी के माता-पिता के घर में घर बसा लेता है। ऐसा दामाद घरजवांई या लमसेना कहलाता है, सामाजिक नियमानुसार इनका विवाह संपन्न होता है।
परस्पर सहमत होने पर वर पक्ष वधु पक्ष के घर पहुँचता है। दोनों पक्षों की सहमति पर सर्वप्रथम लड़की चिन्हारी (चूमा लेना) का नेंग किया जाता है। समधियों का परस्पर जोहार भेंट करना व कन्या द्वारा पाँव छूकर आशीर्वाद लेना रिस्ता का पक्का होना मान लिया जाता है। यह सब समाज की उपस्थिति में होता है।
दोनों पक्ष आपस में मिल बैठकर फलदान (सगाई) की तिथि निश्चित करते हैं। वर पक्ष सगाई बारात लेकर आता है और सर्वप्रथम महलिया के घर उतरता है, महलिया बारातियों को आदर पूर्वक अपने निवास में डेरा देता है तथा वधू पक्ष को बारात पहुँचने की सूचना देता है।
वधु के घर बारातियों के पहुँचने पर प्रवेश द्वार पर ही शीतल जल से बारातियों का पाँव पखारते हैं और मस्तक में अक्षत का टीका लगाकर आत्मीय अभिनंदन किया जाता है। वधु पक्ष के घर के आंगन में घराती व बाराती एक साथ बैठकर सगाई का नेंग संपन्न करते हैं। इस अवसर पर वर पक्ष से आया हुआ कूंड़ा (करी लाड़ू या बुंदी का लड्डू का कलेवा) महलिया के माध्यम से वधु पक्ष को सौंप दिया जाता है। दोनों पक्ष गौरी-गणेश की पूजा करते हैं, वर पक्ष से लाया गया वस्त्राभूषण धारण कर वधू भी गौरी गणेश की पूजा करती है तथा उपस्थित समस्त जनों का पाँव छूकर आशीर्वाद लेती है, दोनों पक्ष के समधी अक्षत चावल दूब आदि का टीका लगाकर जोहार भेंट करते हैं।
दादा जी आपने यह तो बताया ही नहीं कि सगाई का नेंग किस समय संपन्न होता है तथा पूजा कौन कराता है।
यही तो मैं जानना चाहता था कि चीनू रूचिपूर्वक मेरी बातें सुन रहा है या नहीं। हलबा समाज में चढ़ती बेरा को सगाई के लिये अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि दोपहर के समय विद्यमान अभिजीत मुहुर्त शुभ कार्यों के लिये अत्यंत मंगलकारी माना गया है।
मांगलिक कार्य संपन्न कराने के लिये समाज का ही व्यक्ति जोशी (ज्योतिषी) का काम करता है, जगदम्बे, माँ भवानी - दन्तेश्वरी के उपासक को अन्य किसी पुरोहित की क्या आवश्यकता है।
शादी का मुहुर्त निकट आता देखकर वर पक्ष में सक्रियता बढ़ गयी। चावल-दाल, तेल-फूल, कपड़ा-लत्ता धीरे-धीरे सबका जोरा होने लगा। हता भर बचा था कि घर का मुखिया लगिन पहुँचाने की व्यवस्था में लग गया। घर की वरिष्ठ महिला कुछ ज्यादा ही उत्साहित थी, कभी बहू को, कभी बेटा को और कभी खुद दौड़-दौड़कर सामान सकेलने में लग गयी, और गिनती कर-कर के हाँ ये पर्रा और बिजना हो गया, तेल चधनी मौर को, करसा में भर दिया, तेल हल्दी को बड़े जतन के साथ गठिया के रख दिया और ले जाने वालों को विशेष समाझाईश दी - सम्भाल के ले जाना, ऐसी-वैसी जगह रखना मत, और हाँ वो तेल चधनी साड़ी को बता के देना, फिर सारा सामान एक साथ संजोकर उनको रवाना कर दिया।
मोटर सायकल स्टार्ट किये और दोनों सामान लेकर हवा में उड़ने लगे। जाते-जाते उन्होनें महलिया को मोबाइल से अपने आने की खबर दे दी। महलिया के साथ वे सगा के घर पहुँच गये। महिलाओं ने देहरी में लोटे से पानी डालकर पहुना समेत लगिन का स्वागत किया और यथोचित आदर सहित अंदर लिवा लाये।
मांगलिक कार्यक्रम का प्रारंभ हो चुका है, आंगन के बीचों बीच खाट बिछाकर नयी चादर डाल दी गई। देवी देवताओं की पूजा-अर्चना की गई। दूल्हा राजा नयी धोती में बन ठन कर तैयार है, भाभियों ने देवर बाबू को खींचकर ले आया और कुरवर का नेंग प्रारंभ हो गया। कुरवर चावल के अधपके भात से निर्मित शादी का प्रथम कलेवा होता है।
अगले दिन प्रातः से ही समाज वालों का शादी वाले घर में पहुँचना शुरू हो जाता है, घर का आंगन डूमर, नीम आदि के डारा से ढँक दिया जाता है। प्रवेश द्वार पर दो लम्बे बाँस गड़ाकर ऊपरी भाग में बाँस के टुकड़े क्रास करके बांध दिए जाते हैं तथा नीम के डारा से सजा दिया जाता है, यह मांगलिक प्रवेश द्वार हलबा समाज की विशिष्ट पहचान है।
बाजे-गाजे के साथ पूजा सामाग्री लेकर महिलायें मूड़ा परघाने के लिये निकल पड़ती हैं। ढेंड़हा नयी धोती कंधे में डालकर चलने लगता है। बस्ती के प्रवेश द्वार पर मुड़ा की विधिवत पूजा की जाती है। बढ़ई छोल चांचकर मूड़ा को कलात्मक रूप देता है तथा महिलायें रंगों से मूड़ा के सौन्दर्य को निखारती हैं मड़वा में कलात्मक रूप से सजा हुआ कलश स्थापित किया जाता है, जिसकी अखण्ड ज्योति विवाह के समापन तक प्रज्वलित रहती है।
दादा जी हलबा समाज में लकड़ी का ही मूड़ा क्यों प्रचलित है, इसके पीछे भी कोई विशेष बात अवश्य होगी।
तुम्हारा सोचना बिलकुल सही है, चीनू। पाण्डव लोग वनवास में थे, वनवास काल में विवाह का आयोजन करना पड़ा, धर्मराज युधिष्ठिर ने महाबली भीम को जंगल से मूड़ा लाने का निर्देश दिया, भीम जंगल से चार नामक वृक्ष ही पूरा काटकर ले आया और मंडप में उल्टा गड़ा दिया, तभी से यह हमारी परंपरा में शामिल हो गया है। मूड़ा उल्टा ही गड़ाया जाता है, चार का वृक्ष न मिलने पर आंवला, महुआ, रोहिना, डूमर आदि का भी प्रयोग किया जाता है।
मड़वा छाने के लिये बस्ती के बाहरी भाग से आम रास्ते से मिट्टी उठायी जाती है, इसे चूलमाटी कहते हैं, ढेंड़हा सब्बल लेकर चलता है, स्थान विशेष पर पूजा अर्चना की जाती है, ढेंड़हा सब्बल से खुदाई करता है, ढेंड़हिन मिट्टी बटोरती है। महिलायें चुहलबाजी करते हुये ............. तोला माटी कोडे ला, तोला माटी कोडे़ ला नइ आवे मीत, धीरे-धीरे, धीरे-धीरे .........................................गाती हैं।
मंडप अब पूरी तरह बनकर तैयार हो चुका है तथा तेल हरदी चढ़ाने की तैयारी होने लगती है, अतः इसके पूर्व गाँव की डिहवारिन दाई शीतला माता के मंदिर में करसा मौर तेल हरदी चढ़ाकर माता की मनौती की जाती है। प्रथम तेल हरदी माता को चढ़ाकर विनती की जाती है कि घर मे आयोजित शुभ मंगल कार्य में कोई विघ्न बाधा न आवे माता का आशीर्वाद लेकर घर लौट आते हैें।
रात्रि में प्रथम तेल माई घर में चढ़ता है इसे चोर तेल कहते हैं, ईष्ट देवी की पूजा अर्चना के पश्चात बिना मौर बांधे कमरे के अंदर चोर तेल चढ़ता है, इसके पश्चात मंडप में तेल चढ़ता है और रात में मायन नाचा होता है। घर में मड़वा गड़ा हो और महिलायें चुप रहें ऐसा हो ही नहीं सकता, महिलाओं द्वारा सुमधुर मांगलिक गीत ...........’’मड़वा में दुलरू हो हरिहर, हरिहर, हो हरिहर हरिहर, एक तेल चढ़गे ............... हो हरिहर हरिहर .................... के साथ बिहाव के मड़वा में अलग ही समा बंध जाता है, स्त्री पुरूषों के पाँव थिरकने लगते हैं। हरदी पानी के साथ पूरा मड़वा घर रोमांचित हो जाता है मांदर के थाप व मोहरी के धुन में थिरकते पूरा माहौल हरदी पानी व लोक संगीत के धुन में सराबोर हो जाता है।
बारात परघौनी के पूर्व कनकन का रस्म पूरा कर लिया जाता है तथा परघौनी के बाद दुल्हन का तेल उतारा जाता है। वर पक्ष में बारात प्रस्थान के पूर्व कनकन व तेल उतारने का काम पूरा हो जाता है। महिलायें बारात प्रस्थान के पूर्व मंडप में ही दुल्हे का मौर सौंपती है। ज्योति कलश लेकर वर की परिक्रमा करती हैं तथा मौर सौंपते हुए शुभाशिष प्रदान करती है।
बारात का शुभागमन होने पर एक निश्चित स्थान पर बरातियों को अस्थाई डेरा दिया जाता है। वधु पक्ष वाले सदल बल नाते-रिस्तेदारों के साथ सज-धज कर बाजे-गाजे के साथ बारात परघाने पहुँच जाते हैं दोनों पक्ष के समधी लोग पूजा अर्चना करते हैं और गले लगाकर उत्साह पूर्वक जोहार भेंट करते हैं। समधियों को हाथ में हाथ लेकर आदर-पूर्वक लिवा लाते हैं। बरातियों की रैली मड़वा छूने के लिये मड़वा घर की ओर मस्ती में झुम झुमकर नाचते गाते रवाना हो जाती है।
मड़वा घर के प्रवेश द्वार पर दो कन्यायें जल कलश लिये खड़ी रहती हैं, दो युवतियाँ हाथों में पर्रा लिये वर को मड़वा छूने से रोकने का असफल प्रयास करती हैं। दुल्हा राजा तेंदुसार या शीशम की चमचमाती लाठी से मड़वा छूने में सफल हो ही जाता है फिर वह नेंग स्वरूप स्वेच्छा से जल-कलश में सिक्का डाल देता है। इसी अवसर पर आरती व अक्षत द्वारा वर का स्वागत कर इच्छानुसार भेंट देती है तत्पश्चात दुल्हा राजा अपने डेरा में वापस चला जाता है।
इधर बारातियों के लिये भोजन की तैयारी होने लगती है और उधर महिलायें लाल भाजी के लिए दुल्हा डेरा पहुँच जाती हैं। यह एक मनोरंजक प्रसंग होता है। जहाँ वधु की सहेलियाँ हास-परिहास द्वारा भाटो को तौलने का प्रयास करती हैं। चतुर दुल्हा राजा भी इन कुड़ियों के इरादों को भांपते हुए सवा-शेर बनकर कुशल भाटों होने का संकेत दे ही देता है। हंसी-ठिठोली के बीच लाल भाजी का यह नेंग सम्पन्न हो जाता है।
’’दादा जी यह बतलाइए कि दुल्हा की वेशभुषा कैसी होनी चाहिए’’ चीनू भाई हमारे हलबा समाज में मांगलिक अवसरों पर पारम्परिक परिधानों का ही प्रयोग किया जाता है। भांवर के समय दुल्हा राजा धोती कुर्ता पगड़ी और छिन्द के मौर में सजे रहते हैं।
भांवर के लिये दुल्हा के मड़वा घर में आने के पूर्व ही दुल्हन की वस्त्राभूषण साज-श्रृंगार मौर आदि मड़वा घर में बाजे-गाजे के साथ पहुँचा दिया जाता है, जोशी जी के मार्गदर्शन में भांवर की तैयारी होने लगती है। दुल्हा और दुल्हन सज-धज कर मंडप में पहुँच चुके हैं। ढेंड़हा और ढेंड़हिन अपने पक्ष के दुल्हा और दुल्हन को उचित समझाईश देते हैं। जोशी जी लगिन चउंर दुल्हा दुल्हन के हाथों में देकर मुट्ठी में कैसे सम्भाल कर रखें ? ये आवश्यक हिदायत देते हैं। दुल्हा और दुल्हन आमने-सामने मुँह करके खड़े हो जाते हैं और बीचों-बीच वधु पक्ष द्वारा प्रदत्त पिछोरी को पर्दे की तरह लेकर दो लोग खड़े हो जाते हैं। जोशी के द्वारा इशारा करते ही पिछोरी का पर्दा सरक जाता है, वर-वधु पवित्र लगिन चउंर एक-दूसरे की ओर फेंकते हैं। शीघ्रतापूर्वक वर, वधु की ऊँगली पकड़कर खड़ा हो जाता है। लगिन (पाणिग्रहण) का रस्म होते ही उपस्थित लोगों में हर्ष की लहर दौड़ने लगती है। तत्पश्चात् भांवर प्रारम्भ हो जाता है, वर-वधु मड़वा के चारों ओर परिक्रमा करते हुए सात फेरे पूर्ण करते हैं। गृहस्थ रूपी चक्रव्यूह के सातों दरवाजोें को सात फेरों द्वारा पार किये जाते हैं या युं कहे कि सात फेरों द्वारा सातों वचन पूरा करने का संकल्प लेते हैं ............. ’’सात पीढ़ी का सजन होकर इन्द्र धनुषी छटा बिखरती रहे’’ मन में ऐसी साध लिए सातों परिक्रमा पूरी करते हैं।
अब बारी आती है धरम-टीका की, सर्वप्रथम माता-पिता आते हैं, जल और दूध से वर-वधु का पाँव पखारते हैं, बारी-बारी से अक्षत-चावल का टीका लगाकर बेटी को अपनी हैसियत के मुताबिक जो देना होता है, उसे अर्पित करते हैं। इसी क्रम में चाचा-चाची, मामा-मामी आदि भी धरम-टीका कर वर-वधु को अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं धरम-टीका के अवसर पर महिलाओं द्वारा गाया जाने वाला यह गीत वातावरण को और भी ज्यादा मर्मस्पर्शी बना देता है ...............................
’’इहि धरम-धरम गा, अगा मोर ददा फेर धरम नई तो पाबे गा, अवो मोर दाई, फेर धरम नई तो पाबे ओ .............................................’’
शादी का रस्म पूरा होने के पश्चात भोजनोपरांत बिदाई का रस्म पूरा किया जाता है। बांस से बनी झांपी में वधु की रसोई के लिए आवश्यक जोरन रखा जाता है, वधु के साथ ही साथ यह जोरन भी विशेष सावधानीपूर्वक सम्हाल कर ले जाते हैं। बारात वापस आने पर गाँव में किसी उचित स्थान पर वर-वधु व लोकड़ाहिन आदि को ठहरा दिया जाता है, उधर मण्डप वाले घर में आँगन को गोबर से लिपकर चैक पुर दिया जाता है। घर की महिलाएं नहा-धोकर, सज-धज कर तैयार हो जाती हैं, बहु के रूप में लक्ष्मी साक्षात् प्रकट होकर प्रथम गृह-प्रवेश करने जा रही है, अतः महिलायें आरती सजाकर उस क्षण की बेसब्री से प्रतीक्षा करती हैं, उसी दिन दोपहर पश्चात वधु पक्ष के लोग चैथियां आते है, इसका विशेष महत्व है। चैथिया के माध्यम से समधिनों का मेल-मुलाकात, जोहार भेंट तथा बेटी का घर देखने का सुअवसर मिलता है, अतः यह चैथिया का नेंग विवाह का आवश्यक व महत्वपूर्ण नेंग माना जाता है। ढलती बेरा में चैथियां की परघौनी विवाह रस्मों के सुखद समापन का शुभ संकेत देती है। सूरज ढलने के पश्चात मण्डप में धरम-टीका का आयोजन किया जाता है, वर के माता-पिता, चाचा-चाची, मामा-मामी आदि नाते-रिस्तेदार दो बीजा चउंर टिककर वर-वधु को अपना असीम आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
बिहाव झरने के बाद शुभ दिन देखकर अरवाचउंर खाने का कार्यक्रम तय किया जाता है, यह मुख्यतः पारिवारिक रस्म है जिसमें परिवार की ईष्ठ देवी देवताओं की पूजा होती है तथा बहु को इस परिवार के नए सदस्य के रूप में सम्मिलित किया जाता है। सामान्यतः समान गोत्रज वाले ही अरवाचउंर में शरीक होते हैं। देवी को अर्पित कलेवा के भोग का प्रसाद सबको परोसा जाता है, नई बहु सभी सदस्यों को भोजन परोसती है तथा संकल्प करती है कि वह ऐसे ही आतिथ्य-सत्कार कर परिवार की मान मर्यादा की रक्षा करती रहेगी।
इति श्री
मंगलवार, 16 दिसंबर 2008
पिंजरा के सुवा
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